मस्तक पर आकाश उठाये-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मस्तक पर आकाश उठाये-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मस्तक पर आकाश उठाये, धरती बाँधे पाँवों से!
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

चन्दनवाली सांस तुम्हारी, कुन्दनवाली काया है,
बादलवाली धूप उजाली, पीपलवाली छाया है,
सावन-नैना मधुॠतु-बैना, भादों-कुन्तल केशा तुम,
सुबह-दुपहरी, शमा-सुनहरी, सभी तुम्हारी माया है,
उजड़ी रातोंवाला काजल, बिछुड़े नयनोंवाला जल
सुनो तुम्हीं को बुला रहे सब उन अजनबी चिताओं से !
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

पडें तुम्हारे पाँव जहाँ, हो तीरथ वहाँ सवेरे का,
खुले तुम्हारा द्वार जिस समय, घूँघट खुले उजेरे का,
छू लो तुम जो दीप सितारा बन जाये जग का प्यारा,
पूनम का दर्पन हो जाये काला देश अंधेरे का,
किरनों की करधनी पहन धरती सोलह सिंगार करे
तुम जब अपनी धूप उड़ाओ, उड़ती हुई हवाओं से ।
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

तुम जब दो आवाज़ पहाडों की बोली मिट्टी बोले,
तुम जब छेड़ो तान, चाँदनी घट-घट में चन्दा घोले,
तुम जब हो नाराज़ ध्वस्त हो जाए रूढ़ि, पुरातनता,
तुम जब हँस दो, प्राण ! धरा के लिए स्वर्ग का मन डोले,
बजे तुम्हारी पायल जिस दम सूने में, वीराने में
हँसती हुई बहारें बरसें रोती हुई घटाओं से!
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

तुम उनका श्रृंगार करो जिनका पतझरों में घर है,
तुम उनका जयकार बनो जिनका तलवारों पर सर है,
तुम उनको दो मुकुट धरा की धड़कन हैं जिनकी साँसें,
तुम उन पर जलधार झरो, जिनका अंगारों का स्वर है,
जिनका रक्त सिंदूर सुबह का, जिनका स्वेद सूर्य जग का
उनकी कीर्ति-पताका बन तुम फहरो सकल दिशाओं से!
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

नयन तुम्हारे दीप बनें जब पूजा हो जग में श्रम की,
शीश तुम्हारा सीढ़ी हो नव जन-युग के जन-संगम की,
श्वास तुम्हारी कहे कहानी उन सब मिटने वालों की
जिनकी अर्थी देख न पायी सेज किसी भी शबनम की,
सबसे पहले रक्त तुम्हारा रवि के भाल करे टीका
जिस दिन सुर्ख सबेरा बाहर निकले सर्द गुफाओं से!
तुम निकलो जिन गाँवों से, सूरज निकले उन गाँवों से!!

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