मसख़रा- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

मसख़रा- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

इस दुनिया में जहाँ हर कोई लल्ला, हुब्बाख़ातून
यज़ीद, यहूदा
बहती रेत पर नाचने में मग्न
पीड़ित होते हुए भी मसख़रा लगे
जहाँ हर चीज़ की एक आँख
मुस्कराती हुई
आँसू बहाती हुई
जहाँ अफ़लातून अनाड़ियों का दरवेश लगे
जहाँ ज़रतुश्त का आतिश-क़दा
पानी उगले;
उसी दुनिया में
नफ़रत का तेज़ाब चूसना
हीरक की क़ै करना
सिमरन को सँभाले रखना, तस्बीह को जला डालना
आँगनों के बीच सख्त, काँटेदार तार कस देना
काले की पराजय और गोरे की जीत
शाबाश!
अपना ही खून उछाल कर
पागल कुत्तों को भड़काते जाओ।

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