मवाज़नए ज़ोरो कमज़ोरी-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

मवाज़नए ज़ोरो कमज़ोरी-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ज़ोर जब तक कि हमारे बदनो तन में रहा।
पच गई दम में, अगर कैसी ही असक़ल थी दवा।
खूंदे गुलज़ारो-चमन गुलशनो बाग़ो सहरा।
दौड़े हर सैर तमाशे में खु़शी से हरज़ा।
ज़ोर की खू़बियां लाखों हैं कहूं मैं क्या क्या॥1॥

ऐशो इश्रत के मजे़ जितने कि जब ज़ोर में हैं।
खु़र्रमी खु़शदिलीयो ऐशो तरब ज़ोर में है।
लज़्ज़ते फ़रहते क्या कहिये अजब ज़ोर में हैं।
ज़िन्दगानी के मजे़ जितने हैं सब ज़ोर में हैं।
सच है यह बात कि है ज़ोर ही में ज़ोर मज़ा॥2॥

जब से कमज़ोर हुए तब से हुआ यह अहवाल।
सुस्तियो ज़ोफ़ो क़ाहत की चढ़ाई है कमाल।
हो गये सब वह उछल कूद के नक़्शे पामाल।
अब जो चाहें कि चलें फिर भी इसी तौर की चाल।
क़स्द करते हैं बहुत पर कहीं जाता है चला॥3॥

पानी पीते हैं तो बलग़म वह हुआ जाता है।
और दही चक्खे़ तो छींकों का मंढा छाता है।
पीवें शर्बत तो हवा ज़दगियां वह लाता है।
और जो कम खायें तो फिर जोफ़ से ग़श आता है।
पेट भर खावें तो फिर चाहिए चूरन को टका॥4॥

राह चलने में यह कुछ जोफ़ से होते हैं निढाल।
हर कदम आते हैं पा बोस को सौरंजो मलाल।
औरटुक तुंद हवा चलने लगी तो फ़िलहाल।
चलनी पड़ती है फिर उस वक़्त तो उस तौर की चाल।
जैसे कैफ़ी कोई चलता है बहुत पीके नशा॥5॥

ऊंची नीची जो ज़मीं आ गई रस्ते में कहीं।
उसकी यह शक्ल है क्या कहिये नक़ाहत के तईं।
यक बयक दोनों से गुज़रे तो यह ताक़त ही नहीं।
उतरें नीचे को तो गिर पड़ने के होते हैं क़रीं।
और जो ऊंचे पे रक्खें पांव दम आता है चढ़ा॥6॥

आवे गर जाड़े का मौसम तो ख़राबी यह हो।
पहने नौ सेर रुई की जो बनाकर दोतो।
तो भी हरगिज़ गुल गरमी की नहीं आती बो।
हो बदन सरद कि खूं इसमें हो ऐसा जिस को।
देखे गर बर्फ़ का थैला तो रहे सर को झुका॥7॥

और अयां होवे जो टुक आगे हवा गरमी की।
उसमें कुछ और ही होती है नक़ाहत सुस्ती।
मोम होते हैं जहां तन को ज़रा धूप लगी।
और पसीनों में यह सूरत है बदन की होती।
जैसे ग़व्वास समुन्दर में लगावे गोता॥8॥

जोफ़ के दाम में हैं अब तो कुछ इस तौर असीर।
जिसमें न ताक़ते तहरीर न ताबे तक़रीर।
ताब अफ़्सुर्द दिल वाज़र्द बदन सख़्त हकीर।
जो जो कमज़ोरियां करती हैं वह क्या कहिये “नज़ीर”?।
ऐसे बेबस हैं कि कुछ दम नहीं मारा जाता॥9॥

 

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