मन रे प्रभ की सरनि बिचारो- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

मन रे प्रभ की सरनि बिचारो- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

मन रे प्रभ की सरनि बिचारो ॥
जिह सिमरत गनका सी उधरी ता को जसु उर धारो ॥1॥रहाउ॥
अटल भइओ ध्रअ जा कै सिमरनि अरु निरभै पदु पाइआ ॥
दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ ॥1॥
जब ही सरनि गही किरपा निधि गज गराह ते छूटा ॥
महमा नाम कहा लउ बरनउ रामकहत बंधन तिह तूटा ॥2॥
अजामलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा ॥
नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा ॥3॥4॥632॥

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