मन रे गहिओ न गुर उपदेसु- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

मन रे गहिओ न गुर उपदेसु- शब्द-सोरठि महला ९-ੴ सतिगुर प्रसादि-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥
कहा भइओ जउ मूडु मुडाइओ भगवउ कीनो भेसु ॥1॥रहाउ॥
साच छाडि कै झूठह लागिओ जनमु अकारथु खोइओ ॥
करि परपंच उदर निज पोखिओ पसु की निआई सोइओ ॥1॥
राम भजन की गति नही जानी माइआ हाथि बिकाना ॥
उरझि रहिओ बिखिअन संगि बउरा नामु रतनु बिसराना ॥2॥
रहिओ अचेतु न चेतिओ गोबिंद बिरथा अउध सिरानी ॥
कहु नानक हरि बिरदु पछानउ भूले सदा परानी ॥3॥10॥633॥

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