मन क्या होता है-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मन क्या होता है-दर्द दिया है-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

उससे लगन लगाई जिसका
नाम न जाना, ग्राम न जाना,
उस पर उमर गँवाई जिसको
पाना है खुद को खो आना,
उस संग खेला खेल कि जिसका
जन्म विरह है, मरण मिलन है,
उससे जोडी गाँठ न जिसको ज्ञात कि बंधन क्या होता है?
उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

बृज में श्याम बसे राधा का,
गोकुल में गोपी का ग्वाला,
मेरे पी का पता न कोई
कहाँ बिछाऊँ मैं मृगछाला
किससे पूछूँ किसे बुलाऊँ
किस-किस डगर भभूत रमाऊँ

उसे समर्पित हूँ न जिसे यह ज्ञात समर्पण क्या होता है?
उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

मथुरा ढूँढी काशी ढूँढी,
ढूँढ़ फिरी जीवन-जग सारा,
उस छलिया का गेह न पाया
साँस-साँस ने जिसे पुकारा,
छिल-छिल छाले गये पाँव के
तार-तार हो गई चुनरिया,

उस छवि पर हूँ मुग्ध न जिसको ज्ञात कि दर्पण क्या होता है?
उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

भूख भुलाई, प्यास भुलाई
हँसी खो गई, खुशी खो गई,
निद्रा रूठी, जागृति छूटी
सुबह-शाम एक-सी हो गई
भोग न भाया, जोग न भाया
पूजन-जप कुछ नहीं सुहाया,
उसकी हूँ प्रेयसी न जिसको ज्ञात प्रदर्शन क्या होता है?
उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

सावन गरजा, भादों बरसा,
दामिनि देख गगन बौराया,
मेरे मन की बगिया में पर
एक न दिन झूला पड़ पाया,
कौन पीर मेरी पहचाने
कौन दरद-दुख मेरा जाने
उससे होती खेती जिसको ज्ञात न फागुन क्या होता है?
उसको मन दे दिया जिसे यह ज्ञात नहीं मन क्या होता है?

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