मन के घाव नये न ये तेवरी-रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Man Ke Ghav Naye Na Yeh Part 1

मन के घाव नये न ये तेवरी-रमेशराज -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshraj Man Ke Ghav Naye Na Yeh Part 1

सदा न मिलती हार, सदा न रहते द्वन्द्व यूँ
ऐसे घुटना टेक ना, ऐसे घुट ना यार। 1
काल न देखे काल, भाल न देखे भाल को
भीमकाय तू है भले मत गरूर कर यार। 2
खल की बातें मान, बढ़ा मान किसका भला
विष में मिलकर दूध भी विष हो आखिरकार। 3
रिश्वत को लाचार, अब पूरी सरकार ही
फाइल को सरका रही, इंच-इंच दो चार। 4
दिखे विश्व-बाजार, रंग और बदरंग अब
इत में हाहाकार है, उत में हा! हा! कार ! 5
फिल्मी गाने गात, गुण्डे गोदें गात को
खून-खराबा बढ़ रहा, भारी अत्याचार। 6
लील गयी सरकार, सखी स्वदेशी काम को
बेकारी इतनी बढ़ी, बेका री! घरबार। 7
नहिं महँकावै प्यार तानसेन अब तान से
जिसमें हो बस तान ही, बसता नहीं दयार। 8
धन की आज अपार, करे लूट धन्वन्तरी
फिर बाही धन बनत री कोठी बँगला कार। 9
करे शुद्ध व्यापार, जो शासन के नाम पर
मूल ब्याज बाकी लिखे, अब बा की सरकार। 10
विज्ञापन हित यार, फैशन-शो में जीतकर
बड़ी चटपटी, चट पटी नारि विश्व-बाजार। 11
घर में आखिरकार, क्लब से लौटी नारि का
हुआ आगमन, आग मन पिय के भरी अपार। 12
जीतें आखिकार, एक रहे तो युद्ध हम
मन का आज मिलान कर, मिला न कर तू यार! 13
चापलूस लाचार, युद्ध लड़ेगा क्या भला
चाटतु जो तलवा रहे उसे न दो तलवार। 14
भीषण हाहाकार, जित देखो उत पाप ही
अब तो ले अवतार तू जनता को अब तार। 15
इज्जत यूँ न उतार, तू मजदूर-गरीब की
रोजनामचा मत दिखा, रोज ना मचा रार। 16
हो जा फिर तैयार, दुश्मन से तू युद्ध को
इतना अब तै यार है, जीत बनेगी हार। 17
आज सिया-सी जान, फँसी सियासी चाल में
छल-प्रपंच सँग आज फिर रावण की हुंकार। 18
साधा रण को ध्यान, साधारण इस बात पर
‘क्यों आया वह सामने मूँछ तान इस बार।’ 19
कुल खोयी कुल-आन, करि दुष्कर्म कपूत ने
पिता सदा गर्वित रहे पहन मान के हार। 20
जान गयी यह जान ‘साथ छोड़ तोता भगा’
माँ का स्वारथ-मोह सँग था बेटे से प्यार। 21
गति जिनका हो मान, कबहु न दुर्गति डालिए
शोभित गति की तान में पहिया और सितार। 22
मान मिलौ नहिं मान, तजि घर बसि ससुराल में
सुना कान से का न रे उसने आखिरकार। 23
मुर्गी का दरवा न, मुंसिफ का दरवान है
चोरी की चतुराइयाँ इत मूरख बेकार। 24
अर्थ-भेद नहिं जान, शब्दों में अन्तर भले
समझदार को ‘नादिया’, ‘नदिया’ एक प्रकार। 25
हाथ गये पड़ ताल, गहन जाँच-पड़ताल में
लिखी दरोगा यूँ रपट अबला की भर प्यार। 26
जैसी भी हों नाल, सुख ही देंगी दुःख नहीं
छाती तक मत ला इन्हें, बस पाँवों पर वार।27
उत डाली झट माल, जिधर माल ही माल था
देख लखपती को हुई अब की ‘सिया’ निसार। 28
नेता जी का जाल, नेताजी बनकर हुआ
अब तो इसके साथ हैं सारे ठग-मक्कार। 29
नेताजी का लाल, करता धरती लाल अब
जहाँ भीड़ मिलती घनी, बम से करे प्रहार। 30
नेताजी की ढाल, उस की नित रक्षा करे
नकली सिक्के ढाल वह, है करोड़पति यार। 31
पंछी के हर हाल, पर वो पर तो नोंचता
भले न पिंजरे में रखे, भले न करे प्रहार। 32
घर में सहज सहेज, काका अब का का रखें
बिखर रहा है आजकल पूरा ही घरबार। 33
परमारथ का इत्र, पास रहे जिसके सदा
ता से समझौता करौ, समझौ ता को यार। 34
लीला पूरा देश, खल का लीला देखिए
ओढ़ रामनामी हुए क्या कौतुक इस बार। 35
कर्जदार की आँख, बही न देखें क्यों बही
लाला के कारण बढ़े निर्धन-मन दुःख-भार। 36
सोचें सत्ताधीश, कलम होय कैसे कलम
लगे खोलने नित नये घोटाले अखबार। 37
सम्पति लिखे सिहाय, पगलायी सरकार ये
ऐसी जनगणना करे जनगण नाहिं शुमार। 38
झट बा दल में जाय, सत्ता के बादल जिधर
हर नेता अब दल-बदल करता आखिरकार। 39
अब का राम सिहाय, सूपनखा को देखकर
पढ़े मर्सिया, मर सिया क्यों न जाय इस बार। 40
घर में दाम न लाय, घर को नर बेघर करे
परनारी दामन लिपट करता धन-बौछार। 41
उत ते जित तू जाय, उत्तेजित होगा वहीं
अब तो चारों ओर है शोषण सदा बहार। 42
ज़िन्दा चिनता बाय, यह जिसकी चिन्ता करे
सत्ता को पाकर बना नेता अति खूँख्वार। 43
ले बन्दूक सम्हाल, ‘हो न हार’ यह सोचकर
नेता का सुत हर तरह ‘होनहार’ है यार। 44
‘बाबाजी’ कहलाय, बाबा जी को लूटकर
धन पाये प्रवचन सुना, पैर छुवा हर बार। 45
गोरी परि चित जाय, धन से परिचित हो जहाँ
इसके लिये सराय की प्रगतिशीलता सार। 46
मुखियाजी का न्याय, देखा हमने गाँव में
‘गिरजा’ से ‘गिरि जा’ कहै, अरु टपकावै लार। 47
यह कामुक व्यवसाय जनता को अस लीलता
अब भारी अश्लीलता इण्टरनेट सवार। 48
कहा बनै इत राय, जब ‘लघुता’ इतराय तो
प्रभुता के बिन मद बढै, फूलै बिना बहार। 49
थिरकें गुरु के हाथ, नित शिष्या के बदन पर
विद्यालय में बन गयी, विद्या लय का सार। 50
सत्ता बा नर हाथ, जो रचता उत्पात नव
इसके सँग गीदड़ चतुर बैठे पाँव पसार। 51

 

 

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