मनज़ूर जब कि सांप -शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

मनज़ूर जब कि सांप -शहीदान-ए-वफ़ा-अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

मनज़ूर जब कि सांप का सर भी है तोड़ना ।
बेजा है फिर तो बच्चा-ए-अफई को छोड़ना ।
दसवें गुरू का है जो ख़ज़ाना बटोरना ।
बच्चे की पहले बाप से गरदन मरोड़ना ।
नाज़िम था इस लईन की बातों में आ गया ।
बेमेहर बेधरम की था घातों में आ गया ।

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