मन्क़बत दर शाने अमीरुलमोमिनीन – कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi 

मन्क़बत दर शाने अमीरुलमोमिनीन – कविता (धार्मिक)-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

 

करूं क्या वस्फ़ मैं उनका अलमनाक।
कि जिनकी शान में आया है लौलाक।
फिरा जो अर्श और कुर्सी पै चालाक।
कहां वह और कहां मेरा यह इदराक।
चः निस्बत ख़ाक रा बा आलमे पाक॥1॥

मुहम्मद रहमतुललिलआलमी हैं।
हबीबे हक़ शफ़ीउलमुजनबी हैं।
रसूले पाक ख़तमुल मुरसली हैं।
कोई ऐसा खु़दाई में नहीं है।
लगा तहतस्सरा से ता ब अफ़लाक॥2॥

मुहम्मद और अली याकू़ते अहमर।
दुरे बहरे ख़ुदा ख़ातूने अतहर।
ज़मर्रूद लाल हैं शब्बीरो-शब्बर।
जवाहर ख़ानऐ कु़दरत के अन्दर।
यही पांचों गुहर है पंज तन पाक॥3॥

उन्हीं के वास्ते ख़ुल्दे अदन है।
उन्हीं के वास्ते नहरे लबन है।
बहिश्ती हुल्ला और उनका बदन है।
सदा शेरे बहिश्त और सायए पाक॥4॥

जिसे उनकी मुहब्बत पल ब पल है।
उसी को दीन और दुनिया का फल है।
जो कोई उनकी उल्फ़त में दग़ल है।
तो उस मुरतिद की यारो यह मिसल है।
कि जैसे लेबे तूबा बेच कर ढाक॥5॥

अली जो शहसवारे लाफ़ता है।
अमीरुलमोमिनी शेरे खु़दा है।
फ़लक हैबत से उसकी कांपता है।
अली जो सफ़दरे रोजे़ बग़ा है।
कि जिसकी शर्क़ से है ग़र्ब तक धाक॥6॥

अली है क़ातिले कुफ़्फारे गुमराह।
अली का हुक्म है माही से ता माह।
नबी का कु़ब्बते बाजू यदुल्लाह।
उठावे चर्ख़ की गर्दिश तो वल्लाह।
अभी थम जाये दम से चर्ख़ का चाक॥7॥

अली ने महद में चीरा है अज़दर।
अली ने काट डाले उमरो-अन्तर।
उलट डाला है एक हमले से खैबर।
ख़वास अशया का फेरे गर वह सरवर।
तो हो तिर्याक़ ज़हर और ज़हर तिर्याक़॥8॥

अली को मुस्तफ़ा ने जी कहा है।
अली को जिस्मके जिस्मी कहा है।
अली को लहमके लहमी कहा है।
अली को रूहके रूही कहा है।
यह समझे वह ख़ुदा दे जिसको इद्राक॥9॥

अली को ख़ास निस्बत है नबी से है।
नबी को राह दिल में है अली से।
वह दोनों एक तन और एक जी से।
किसी को ताब क्या गैर अज़ अली से।
जो पहने मुस्तफ़ा के तन की पोशाक॥10॥

अली को जो कोई पहचानता है।
बराबर मुस्तफ़ा के मानता है।
जो इनमें कुछ तफ़ावुत जानता है।
वह अपने ख़ाक सर पर छानता है।
लगाई उसने दोजख़ की मगर ताक॥11॥

अली की दोस्ती में जो मरेगा।
उसी को बाग़ जन्नत का मिलेगा।
अली के बुग्ज़ में जो जान देगा।
वह मलउन दोजख़ अन्दर यों जलेगा।
कि जैसे आग पर जलता है ख़ाशाक॥12॥

जिसे वस्फ़े अली कुछ सालता है।
उसी को दोजख़ आखि़र ढालता है।
जो उनका बुग्ज दिल में पालता है।
गोया भर कर के डलियां डालता है।
वह अपने दीन और ईमान में ख़ाक॥13॥

Leave a Reply