मधुबाला-एक प्रयाण-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

मधुबाला-एक प्रयाण-राजगोपाल -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajagopal

तुम बहती रुधिर मेरी, तुम्हे रग-रग में भर डाला,
तुमसे ही सीखा मैंने जीवन में मधु लिप्त वर्णमाला,
प्यार लिए तुम संग कितनी दूर निकल आया पथिक,
फिर भी दिन खुलता है तुम्हारी ही करवट मधुबाला ||१||

अँधेरा छाने लगा है अब तोड़ दिन का उजियाला,
सो जाऊं तुम्हे देखते आज वक्ष तले मेरी रसबाला,
कुछ देर समय रोक दोहरा लें बीती मीठी बातें,
तुम मिलना निर्बन्ध फिर, उस जीवन में मधुबाला ||२||

दिन डूबा और मैंने थकी पीठ पर रात सम्हाला,
तारों के बीच प्यार ढूंढता कितने आँसू पी डाला,
रात के सन्नाटे में भी अकेला मन नहीं घबराया,
परी सी उजाले में जो यहीं खड़ी थी मधुबाला ||३||

आँखों में विश्व लिये और थामे आशाओं का प्याला,
झरती छत तले, बरसों दम माप रहा था भूखा मतवाला ,
आज तो यूँ ही जी गया, पर कोई ‘कल’ दिखा नहीं,
मन डरता तो लगता, कभी यहीं मिलेगी मधुबाला ||४||

नाच लेता कभी एक पांव पर, खा कर एक निवाला,
चकित होता देख उसे, जो मस्त हुआ पी कर हाला,
छिपी रात, फिर ‘कल’ पर जीने का जब प्रश्न उठाती,
तो सोचता कभी मिलेगी, हाथ पकड़ ले जाने मधुबाला ||५||

बात किसे कहता मन की, स्वयं को है मैंने पाला,
बहे नीर जब, उठा कल्पना, रस मीठे लिख डाला,
अपना ही खंड काव्य लिये, नीड़ से टिका ढूंढता रहा,
श्रृंगार चुराने शब्दों का, आएगी कभी तो मधुबाला ||६||

दिन बीते, रातें बहकीं कागज़ों पर रंग चढ़ा काला,
सपनों का सागर, तब लगता जैसे बहता छोटा नाला,
बह जाएगा जीवन कहीं, लिये आस फिर सांसो की,
जब मधुमास उड़ा लाएगी, मन से मन तक मधुबाला ||७||

मैं पथिक चलता रहा लिए पांव में दबा छाला,
कभी छांव तले रुक कर सोचता, है कोई संगवाला,
चढ़ सीढियां न जाने कहाँ जाने की लगी थी धुन,
अनायास देखा उस शाम, तो पास खड़ी थी मधुबाला ||८||

मेरी यह परिभाषा, कौन था उस तक पहुँचाने वाला,
होती कोई मधु सी जीवन में, सहलाती मन सुरबाला,
जी लिया चढ़ती रात, मनु स्मरण कर कल्पनाओं में,
चांदनी भी कह गयी, कहीं वही तो नहीं मधुबाला ||९||

ललक उठा मन, उसकी छवि ने उर भर डाला,
शचि सी सुन्दर, जगा गई मनोरथ जैसे तपती ज्वाला,
हुई वह प्राण सी प्रतिष्ठित, केवल एक ही दृष्टि में,
मन से हटी नहीं कभी फिर, दूर खड़ी मधुबाला ||१०||

दिन सरक गए कितने, नहीं सोयी रातें किये उजाला,
तन लगी नहीं रसोई, मन पर था उसका ही बोल-बाला,
न जाने कहाँ बदरी बन उड़ गयी, धूप में प्यास जगा,
कोई दिशा दिखती तो, ढूंढ लेता तारों में भी मधुबाला ||११||

मन विचलित ढूंढता रहा उसे, भर ईप्सा का प्याला,
सोचता रहा मैं अकेला, समय ने जीवन कैसा ढाला,
ऐसा लगा था उसे पाकर जैसे उमंग फिर लौट आया,
पर कितना अंधकार बिखेरा है, छिप कर तुमने मधुबाला ||१२||

लगता मुझे घर में भी, जैसे जी रहा घर से निकाला,
दुःख तो बहुत पिया मैंने, और हँसना भी टाला,
उम्मीद लिए फिर भी, आज निकल पड़ा हूँ ढूँढने उसे,
ईश्वर भी रोये इस संध्या, पर बैठी थी वहाँ मधुबाला ||१३||

मिल जाती वह दुपहर ढले, हो जाता तन-मन निराला,
नित देखने उसे मैंने भी, एक जीवंत उपाय निकाला,
मैं वक्ता बन उसके सामने, खड़ा बरसों सा अनुभव करता,
सुननेवालों से भीड़ में कहीं, लगती थी अलग मधुबाला ||१४||

देखता ही रहा उसे, हुआ मूक मन मतवाला,
सोच रहा था कब खुलता उसकी अधरों का ताला,
सोचता मुझे देख, कंठ खोल एक प्रश्न तो कभी पूछती,
श्रृंगार लिए सब कह जाती, आँखों से ही मधुबाला ||१५||

उसने कुछ पूछा एक शाम तो लगा भाग्य ने कह डाला,
उत्तर हूँ मैं प्रश्न का, निथरा भविष्य से प्रेम का हाला,
रूचि-सुरुचि पूछा उससे, अब आँखों में आँखें डाल देख सका,
बात तो तनिक हुई, पर उतर आई स्वर्ग से मधुबाला ||१६||

भूख भी नहीं लगती अब, पथ भटक गया खानेवाला,
मन बांधने लगा महल, रेत में ही हो मतवाला,
नहीं आ रहा था कुछ समझ, उसे कैसे पास बुलाऊं,
दौड़ता रहा सारी रात धूप में, ऐसी मृगतृष्णा बनी मधुबाला ||१७||

अकेला हुआ मैं फिर, मिला न कोई संग रोनेवाला,
जाता कहाँ, लौट आया फिर वहीं, देखने सांध्य-बाला,
बीत गए सात दिन, न ही पता उसका, न ही ख़बर कोई,
गुम हो गयी अचानक, गगन में उल्का सी मधुबाला ||१८||

आज सुबह सूरज ने, फिर बिछुड़ी स्मृतियों को उबाला,
चला मैं फिर बुझा-बुझा सा, लिए मन-जला छाला
सोचा मिली नहीं यदि वह, तो जीवन होगा कैसा,
मै नि:शब्द हुआ, स्तब्ध रहा, वहां खड़ी थी मधुबाला ||१९||

कहते जीवन मधुर है कितना फिर विरह कहाँ से मैंने पाला,
मरीचिका ने पता नहीं, मन में कैसा जादू कर डाला,
नाप लिया मैंने यूँ ही, आँखों में पांच मॉस का अन्तराल,
‘कालान्तर’ लिख लिया मैंने, लिए साथ में मधुबाला ||२०||

गुण छिपे थे उसमे कई, मृदु भाव लिए उसे निकाला,
वह थी रुचिका पाठक, कहानियों से जुडी सुन्दर बाला,
बात कुछ और बढ़ी, मेरी भी सोयी रचनाएँ उछल पड़ीं,
एक छोटी रचना ‘कालान्तर’ को भी भा गई मधुबाला ||२१||

प्रतीक्षा थी कि वह समझती, नहीं मैं कोई भ्रमर भोला-भाला,
ऐसी रचनाएँ लिख सोचता पहन पाउँगा कल जयमाला,
डरा हुआ था मन, पूछता क्या उससे कहानी की आत्मा,
मन बांधे आहट सुनता रहा, पास आ रही थी मधुबाला ||२२||

साथ हो चला मैं उसके, जैसे कल पर परदा डाला,
चलते कुछ बात चली वैसी, कि ह्रदय हुआ विशाला,
एक प्रश्न उठा, जब बिछुड़ना ही अंत है तो जुड़ना कैसा ?
रूठी ध्वनि से, आँखें झुकाई चल रही थी मधुबाला ||२३||

दुपहरी में दोनों मौन, कुरेद रहे थे मन का जाला,
सुन्दर आँखें, सीपियों से जैसे गुंथ रही थी माला,
वह ऊंची टहनी की सुमन, जिसे पाने सभी देखते,
मैं निर्निमेष श्रृंगार बांचता रहा, पास बैठी रही मधुबाला ||२४||

सन्नाटा टूटा, लगा ईश्वर ने इसे कितने श्रम से ढाला,
सुन्दर आँखें, कोमल कपोलों पर हिलता कान का बाला,
पूछ लिया निर्भय हो मैंने, क्या साथ रहोगी जीवन भर,
नि:संकोच हाँ कह दी पल में, उँगलियाँ छूती मधुबाला ||२५||

आज लगा, जैसे छू गया हो अधरों से सोम का प्याला,
भीग गया मैं, जो अब तक था छन-छन जलने वाला,
मन करता मैं सो जाऊं उसकी नीड़ से टिक कर,
देखता ही रहा उसे मैं, अब तो भाग्य बनी मधुबाला ||२६||

निहारता रहा कल्पना मनु की, पिरोता फूलों की माला,
जब पलकें उठा वह मुस्कुराती, मधु बटोर लेता प्याला,
जीवन ठहरा आकर कहाँ, भूख-प्यास छोड़, आँखों में उलझा,
चांदनी खिली अब भरी दोपहरी, लहराई वसंत सी मधुबाला ||२७||

शाम हुई ठंडी उँगलियों पर, सूखा मधु-घट का प्याला,
चल पड़े दूर हम राह पकड़, गढ़ कर स्मृतियों पर ताला,
हर पग पर बातें करते, चले बनाते गगन में घर अपना
आज बारी थी रतजगे की, लिए आखों में मेरी मधुबाला ||२८||

देखता रहा मै दूर राह, ओझल हुई नहीं जब तक शशिबाला,
लौट गया घर, चढ़ती रात छाता अँधेरा कितना काला,
एक प्रश्न उठा कि प्यार तो हुआ, पर अन्तरंग कब होगा उसका,
पूछ रहा उत्तर मैं कल से, उसे आज ढूंढ रही थी मधुबाला ||२९||

रात गई, दिन निकला, आँखों ने दबा प्यार और उछाला,
पा कर खोने का दर्द अनुभव करता है केवल जीनेवाला,
मैं बरसों का अकेला, डरता हूँ नए आयामों में जीने से,
कल मिली हो, तुमने कितना जाना है मुझको मधुबाला ||३०||

आप कहता रहा मै उसे ओढ़े अब तक आदर का दुशाला,
आज संबोधन बदले, पास आ गए हम लिए प्रेम का प्याला,
वह बनी सुरवामिनी और प्यार बना अर्ध्य मेरे जीवन का ,
विश्वास जगा, पग दिशा मिली, आरती हुई मेरी मधुबाला ||३१||

तुम्हारे आकर्षण ने तो जीवन को धरा पर खींच डाला,
आज तुम ही विधा बनी, प्रज्ञां परिणत मेरी शशिबाला,
लगता दिन भी छोटा नित तुमसे मिलने, रातें चलती बरसों,
हम मीलों साथ चले हर शाम, लेकिन हाथ नहीं छूटता मधुबाला ||३२||

चली जाती जब तुम, जलती रात में उर की ज्वाला,
तपन में स्मृतियों की मैं, बना शलभ सा जल जाने वाला,
कुछ दिनों में हम अब जाते किस राह पता नहीं,
क्या होगा कल, जब डाल से टूटे, बिना तुम्हारे मधुबाला ||३३||

देखते एक-दूसरे को हमने कितना समय बिता डाला,
दूर थे बहुत दिन अनुबंधन के,कोई नहीं था पथ बतलानेवाला,
कोई एक सम्हल जाता हम दोनों में, तो जीवन लांघ लेते,
असमंजस में पड़ी, मेरे पास ही खड़ी है मधुबाला ||३४||

एक ओर अपने घर की चाह, दूसरी ओर मधु का प्याला,
मै चक्रव्यूह में फंसा, सोचता कभी कहाँ है वह कल्पित माला,
अधरों की आतुरता में, खोजता रहा कहीं मिल जाता काम जहाँ,
मन कहता कुछ भी हो, तुम्हे तो पाना ही है मधुबाला ||३५||

आज मेरी लम्बी रचना ने फिर उस पर जादू कर डाला,
मन और ठोस हुआ, वह लिपटा जैसे अधरों से प्याला,
प्रण किया हमने कि रहेंगे साथ सदा तोड़ सभी आंधी झंझावत,
आ पहुंचे हम हाथ पकड, उस राह जहाँ मिली थी मधुबाला ||३६||

लाल अधर लगते, जैसे लपट हो प्यार की ज्वाला,
उन्माद है यह तो, कहीं न बन जाये उर का छाला,
मन थमा नहीं आज, कि टिक गए होंठ पल भर उसके माथे,
बन गया सुख-दुःख मिला कर हाला, आज मेरी मधुबाला ||३७||

इस अनुभव से महक उठा, कुछ खोया मन मतवाला,
अब तुमसे दूर हर पल लगता है आग सा जलनेवाला,
होंठों का स्पर्श नहीं, तुम्हारे माथे पर मैंने संकल्प है मढ़ा,
आकाश तपे या आषाढ़ बहे, तुम्हे नहीं छोडूंगा मधुबाला ||३८||

हमने हथेलियों पर एक-दूसरे का नाम लिख डाला,
बंद कर लीं मुट्ठियाँ, गूंथ लिया प्यार का माला,
साथ चले तो लगा कुछ दूर नहीं, जीवन बस चार कदम है,
मैं अडिग हूँ , तुम कभी न अलग होना मधुबाला ||३९||

कल की भुला, आज मिलें हैं हम, तोड़ अँधेरा सुरबाला,
उर में आनंद घुला, जैसे उल्का ने किया उजाला,
आज मन उछल पड़ा है, धरा से गगन तक ऊंचा,
तुम्हे निमंत्रित करता हूँ, घर आना मेरी मधुबाला ||४०||

पग पड़े घर में तुम्हारे, तो दीवारों ने ढाक उछाला,
अर्ध्य सजाये खड़ा हूँ लिए जलते दीपों की माला,
देख लो यह छोटा सा घर और हाथ भर की रसोई,
झरती छत के नीचे, यही सत्य है मधुबाला ||४१||

लाया मीठे अंगूर ढूंढ कर, बना दृष्टि-भेदक काला,
यही है अमोल सत्कार तुम्हारा, मधु-रिसता अंगूरी प्याला,
मीठा कर लो मन, जहाँ सच तो है कुछ कड़वा,
मुख मोड़ न लेना मुझसे, जीवन यही है मधुबाला ||४२||

मुँह में एक अंगूर छिपा तो, बन गया मादक हाला,
तुमने खा ली एक प्रेम से, तो हो गया मैं मतवाला,
प्रण करता हूँ मै, भर दूंगा तुम्हे कल अन्न-आभरण से,
श्रम मेरा और भाग्य तुम्हारा, हम सुख बोयेंगे मधुबाला ||४३||

तुम सुरवामिनी, कैसे समझोगी जीवन पर पड़ता पाला,
धीरे-धीरे गहराता है, ठण्ड में भी नंगे पाँव छाला,
फिर पूछता हूँ आज, क्या साथ चल पाओगी लम्बी राह,
रात भावनाओं को रख परे, सोचना बात मेरी फिर मधुबाला ||४४||

नयी सुबह के साथ, मन ने फिर खोला ताला,
संशय में था पूछूँ कैसे , बुझा कर जलती ज्वाला,
उमड़ उठा जब प्यार, टिक गई ह्रदय से नि:शब्द प्रिया,
तुम बलप्रदा, महोदरी, सत्या, तुम्हे शत-शत नमन मधुबाला ||४५||

घर से धनी तुम, तोड़ गई कैसे यम काला,
सहमा रहता मैं तो, जीवन ने मुझे डर से पाला,
समझ गई थी तुम, मैं क्या दे पाता तुम्हे, तुम्हारे जैसा,
फिर भी कैसा निर्णय है, तुमने कुछ नहीं माँगा मधुबाला ||४६||

अहंकार नहीं, स्वार्थ नहीं, फ़ेंक दिया कहाँ ऐसी हाला,
तुम कल्पना से परे इश्वरी, शुद्ध लौ सी सुरबाला,
प्रेम से भी ज्यादा, तुम पर उमड़ रही है श्रद्धा,
अब तुम ही समझा दो, क्या है जीवन मधुबाला ||४७||

आज दिन ढलते फिर लौट आई है सांध्यबाला,
चांदनी बन बिखरे सपने, और चाँद ने अमृत ढाला,
जेठ में भी बादलों के बीच से, ठंडक छाई नभ में,
तुम धवल रजनीगंधा सी महकी, दूर दर्द में मधुबाला ||४८||

इतने मोड़ हैं,जीवन में, हिमगिरी से जैसे उतरता नाला,
पार कर जायेंगे प्यार में, बहता मन तो होता है मतवाला,
देखो अब दूर दोराहे पर, पग तो पड़ने ही वाले हैं,
मैं लडखडाता रहा विरह में, पर निर्भीक बढ़ी मधुबाला ||४९||

आज आखिरी संध्या थी, समय ने चुप ही कह डाला,
विश्वास था मन में, पर आंसुओं से भर रहा था प्याला,
टूटी स्मृतियाँ, अलग हुए शहर दोनों के, पर एक रहे मन,
तुम्हे आभास किया हवा सा मैंने, कैसी हो तुम मधुबाला ||५०||

मेरी खिड़की से उड़ता पुष्पक, मन-आसमान चीर डाला,
डूबती संध्या सागर किनारे, सहलाता दुःख में खुलता छाला,
कितने बार लिखा, रेत पर नाम तुम्हारा, लहरों से लड़ते,
तुमने बल दिया, पर समझा नहीं आंसुओं ने मधुबाला ||५१||

शोध करता दिन भर, रात में खुलता मन का ताला,
मित्र बना अँधेरा भी, उसके ही साथ ढूंढता सुरबाला,
बीते दिन जेब में रख, कल अकेले ही पुकारता रहा तुम्हे,
सच कहूँ तो, तुम बिन मृत्यु भी नहीं आती मधुबाला ||५२||

सात दिन बीते, आगे तेईस पड़े थे लटकाए भाला,
चुभता था हर पल मुझे, बिना तुम्हारे मेरी शशिबाला,
कितनी कहानियां लिखी तुम पर, एक नाम, परिधि, और श्रीपाली,
पर कडवा हुआ प्रेम का हाला, बिना तुम्हारे मधुबाला ||५३||

आज पत्र लिखते तुम्हे, मैंने मन मिट्टी सा रौंद डाला,
हर शब्द भीग गया, तुम्हारी मधु से जब टिका प्याला,
तुम सच से कल्पना बन कर यहाँ छलक रही थी निर्बन्ध,
मैं खड़ा आज फिर मन के द्वार, ढूंढ रहा मेरी मधुबाला ||५४||

बीते और कुछ दिन, मुझको केवल स्मृतियों ने पाला,
घिर जाता अँधेरा, पर दिखती तुम पास आती सुरबाला,
यहाँ ज्येष्ठ में भी बादल छाये, तडपाये घन सावन बरसे,
नित हाथ पकड़ चलती है, सड़क से सागर तक मधुबाला || ५५||

कैसी है तृष्णा, लगता है पी जाऊं विष का प्याला,
सागर में डूबूं या समा जाऊं भू-तल में, खोल विरह ताला,
कौन परिचित यहाँ, हवा से ही कह लेता कुछ मन की,
मेरे सब छूटे, तुम ही झांक रही आसमान से मधुबाला ||५६||

तकिया भी भीगा कल रात, देख कर मुझे दुःखवाला,
नींद में भी तुम तपती, लिए खड़ी थी मधु का प्याला,
सुबह तुम्हारा पत्र मिला, नाच उठा मन वसंत में किलकारते,
मन से मन निस्संकोच जुडा है, तुम प्राण बनी हो मधुबाला ||५७||

महक रही है तुम्हारे शब्दों की मधुऋतु सी माला,
मन फिर मचला, सागर भी लगा जैसे रस का प्याला,
आज तुम हुई अंतर्यामी, मैं अर्चक आसमान ले भागा,
दिन ढले आँख मिचौली, कितना खेल खिलाती मधुबाला ||५८||

तुम्हारा पत्र सिरहाने रख नित सपनों को भिगो डाला,
प्यासे थे सपने भी, पी लिया तुम्हारे शब्दों का हाला,
रह चलते भी पढ़ लेता हूँ तुम्हे पंक्तियों के बीच प्रेयसी,
हर शब्द संजीवनी लगी, जलती विरह में मधुबाला ||५९||

पत्र का उत्तर लिख, उसे मुट्ठी में भींच डाला,
लिखा पत्र पर नाम कोई, जो पहुंचाती बन सहबाला
सुलझा फिर उसकी सिकुडन, धैर्य जुटा पेटी में डाला,
मन की बात आज उडी, हवा में लहराती मधुबाला ||६०||

कुछ दिन और रह गए पर दहकती रही ज्वाला,
अब थक गया शलभ, जल-जल कर जीनेवाला,
छोटे-से जीवन में कितना दर्द छिपा है सुख के भीतर,
ह्रदय भेद दिखलाऊंगा, कितने उभरें हैं छालें मधुबाला ||६१||

आज लौट रहा हूँ उछलता,मन-स्मृतियाँ सब बाँध डाला,
यही थी पूंजी मेरी, एक प्रयाण लम्बा लांघ डाला,
निकल पड़ा मन में किये तैय्यारी तुम्हारे स्वागत की,

मन भी भागा रेल की गति से, तुमसे मिलने मधुबाला ||६२||
कुल्हड़ भी होंठों को छूती जैसे हो कंचन का प्याला,
आज पटरियों पर बिकती, गर्म चाय भी हुई ठंडी हाला,
कितना उन्मादित है मन, भूख भी आज मीलों दूर खड़ी,
लगा स्वयं को जीत आया मैं, मिलने तुमसे से मधुबाला ||६३||

रेल रुकी, मैं भागा बाहर,लिए स्मृतियों की माला,
खोने का भय, फ़ेंक पेटी में, लगा दिया है ताला,
अब तो जीवन लिए साथ, कूद कर बैठा तिपहिये में,
घर तो दूर से दिखा, पर दिखी नहीं मधुबाला ||६४||

वह नहीं तो क्या, घर ही कर गया उजियाला,
होगी वहीं गालों पर हाथ रखी,मुस्कुराती शशिबाला,
कल खिलेगी फिर उषा, लेकर बीते वसंत की सुगंध,
उड़ आएगी मुझ तक फिर, मेरी बिछुड़ी मधुबाला ||६५||

मेरा घर वैसा ही था, जैसे बरसों से रखा प्याला,
रात नींद नहीं आई, लेटा रहा आँखों में सपने डाला,
थकान, विरह, संताप सभी भुला, सुबह को ताकता,
पल-पल गिनता सोचता रहा, कब आएगी मधुबाला ||६६||

मैं छत पर खड़ा रहा स्वागत में लिए फूलों की माला,
धूप उतरी, एक ही आंसू से भर गया सपनों का प्याला,
मैं निर्वासित सा लेट गया भूखी रात में लिए टूटी आशा,
मैं क्षितिज देखता ही रहा, आज नहीं आई मधुबाला||६७||

जीवन को जैसे ग्रहण लगा, जाने कब होगा उजियाला,
मैं बैठा देखता रहा, अँधेरे ने पल में निगल डाला,
लिखी भाग्य में जितनी, बस उतनी ही मिलती खुशियाँ,
श्रम, संकट, संताप सभी मुझमे, तुम इनसे परे मधुबाला ||६८||

कल गिर कर भी, सबक नहीं सीखा मन मतवाला,
फिर छत पर दौड़ पड़ा, लेकर फीके चाय का प्याला,
व्यर्थ कहलाते हैं प्रेमी, दुःख दूर नहीं, तो अकेले ही अच्छे,
मैं तो जीवन से हारा, अब तुम ही जीत जाओ मधुबाला ||६९||

स्वागत करती है पीड़ा भी, शलभ जलाकर जैसे दीपमाला,
मै थका सीढ़ी पर बैठा, सुलझा रहा था उर का जाला,
आज की आशा डूबी, कल का कौन भरोसा है,
मन हार कर भी टूटता नहीं, कल अवश्य आना मधुबाला ||७०||

आज झूठा ही निर्मोही बन, स्वयं से ही छल कर डाला,
सोचा यही विरक्ति दृष्टिबिन्दु बन, बुला लाएगी सुरबाला,
अकस्मात् आहट सी हुई, लगा दुपहरी कैसे चाँद खिला,
मैं दंडवत हुआ ईश्वर के आगे, द्वार खड़ी थी मधुबाला ||७१||

क्षीण, क्षुद्र, दुर्बल भावनाएं, टूट गयीं जैसे मिट्टी का प्याला,
सुमुखी तुम्हे देख, मन भागा फिर, प्रेम की पाठशाला,
पहले ह्रदय से टिकी, फिर गोद में बालों को सहलाता रहा,
मैं मन्मथ बना पढता रहा उसे, आज कामायनी हुई मधुबाला ||७२||

मूक बने जड़ से, गुटकते रहे दर्द का निवाला,
कितनी बार जलती-बुझती रही मन की ज्वाला,
अब सहन नहीं होता, मरीचिका में दिशाहीन सा चलना,
शब्द नहीं जगे कुछ कहने, मौन ही रही मधुबाला ||७३||

कहीं काम मिलता तो,खुलता जीवन का बंद ताला,
नहीं जानता कौन था वह, सौभाग्य लिए जीनेवाला,
जिसे चांदी की थाल में, मिला प्यार परोसा हुआ,
निस्संदेह जीना तो है साथ तुम्हारे, जतन करो कोई मधुबाला ||७४||

बदला न जीवन में कुछ भी, चढ़ी न सपनों में माला,
बैठे हम उद्विग्न यहाँ, पीते अपने ही आंसुओं की हाला,
तुम्हे देख कर, छू कर, संबल मिलता है थक कर जीने का,
तुम आद्या, महेश्वरी मन की, सोचो कल की मधुबाला ||७५||

बीता दुःख धोते रहे, आँखों से भर विरह का प्याला,
राह मुड रही, यही सोच संकल्प नया फिर ढाला,
यह चाह भर गई मुझमे तन-मन की शक्ति नयी,
दर्द तो होगा आस-पास ही, पर तुम आती रहना मधुबाला ||७६||

फिर आउंगी कह कर निकल पड़ी मुस्कुराती सांध्यबाला,
जग भर बिखरे अंधियारे में, सीख रही थी चलना मृदुबाला,
आँखों से ओझल हुई, तो हम जीते उन्नीसवीं सदी में,
मूक-बधिर से रहते, एक फ़ोन भी असंभव था मधुबाला ||७७||

यह प्यार क्या आषाढ़ के फूलों की है माला,
इनसे जीवन का चित्र बनाया,सांझ ढले रौंद डाला,
प्यार का आभास होते ही क्या यह पल है जानेवाला,
क्यों खुलते ही बंद होने लगते हैं, द्वार हमारे मधुबाला ||७८||

हम समय बांचते रहे, भर जाता यूँ ही दुविधा का डाला,
फिर भी वह आ जाती मिलने, सरका दरवाजे का पाला,
उसमे ही है इतनी हिम्मत, कुछ कर जाने की क्षमता,
लिखी भाग्य में जो मेरे, वही हाथ मिलेगा मधुबाला ||७९||

वह आई धूप से, जैसे छन-छन तपता प्याला,
काँधे पर सर रख, पोंछा आँखों से रिसता तम काला,
कुछ शब्द धीमे से फिसले, कह गए सारे बात अच्छे,
तुम तो हो नंदिनी मेरी, होगी नियुक्ति तुम्हारी मधुबाला ||८०||

साक्षात्कार हुआ उसका, पर डोला मन मेरा मतवाला,
कोई तो द्वार खुला जीवन का, भर जायेगा सुख का प्याला,
बस इतना ही बहुत था, हमें कल का स्वागत करने,
तुम हो तो मैं हूँ, कोई अहम् बीच नहीं मधुबाला ||८१||

मैं उसकी बालों को सहलाता, सुलझाता रहता उलझी माला,
कभी आँखों में झांकता, पी लेता झरोखों से मधु का हाला,
अधरों पर प्रतिबंध लगा था, नहीं डालना मुरब्बा उनका,
मानता हूँ नियम सदा तुम्हारे, पर देना कभी अवसर मधुबाला ||८२||

उसकी प्रतीक्षा में, सावन नित भिगो जाता मधु-घट का प्याला,
फुहारों में छोटा सा घर भी झूमता, सोच तुमसे झरती है हाला,
मन उद्विग्न हुआ पल-पल, पर दौड़ता कहाँ किसे कहने,
अब तुम आ जाना, खुली है राह मेरी मधुबाला ||८३||

भय तो नहीं, पास ही दिख रहा था, समय आनेवाला,
झट निकल पड़ती वह घर से, जब कहता मन मतवाला,
कभी बहाने से, तो कभी काम लिए तिपहिये में, भरी धूप में डोलती,
बीत जाते कुछ मीठे पल, तुम्हे साथ लिए मधुबाला ||८४||

शरद की रात चांदनी भर रही थी मधु का प्याला,
वह नियुक्त हुई पद पर, छलका मन में तपता हाला,
कसे बाहुपाश, फिर आया प्यार आँखों के सामने,
माथे पर बस अधर टिके, तुम जीत गई मधुबाला ||८५||

पास ही था कार्यक्षेत्र उसका, अब भाग्य ने खोला ताला,
मुझे भी कुछ मिला वहीँ, दहकी साथ ही दोनों की ज्वाला,
काल प्रबल है प्यार, उससे ही बल मिलता जीवन को,
अंधे मोड़ों पर भी, अब हम साथ चलेंगें मधुबाला ||८६||

मेरी रचनाएँ जर्जर हो रही थीं, जैसे फूलों की सूखी माला,
जिन्हें पढ़ मन आज भी रोता, भर जाता मधु का प्याला,
इन्हें सादर ‘अंकुर ’ संबोधित कर, जनवाणी का मंच दिया,
तुम्हे निमंत्रित करता हूँ, आना अवश्य मेरी मधुबाला ||८७||

आयोजन छोटा,पर लौट आया भविष्य जाने वाला,
तुम आ गई तो लगा विश्वास कभी नहीं है मरने वाला,
तुमने सारी पढ़ लीं थी, अब तो सुन लीं दूसरों से भी,
तुम अब कविता से निकल, द्वार सामने आना मधुबाला ||८८||

समाचार पत्रों ने कल, कुछ ‘अंकुर’ का किया उजाला,
कतरनें रख लीं मैंने, कल तो मैं ही हूँ पढनेवाला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी,जो दौड़ी छम-छम आँखों में,
क्या तुमने स्वजनों से कुछ कहा, कल रात मेरी मधुबाला ||८९||

अब परसों जाना था दूर नयी नियुक्ति में सुरबाला,
मै घर ही में चुप बैठा रहा नाखून से कुरेदता प्याला,
ईश्वर करे वह लौट आये यहाँ, यही जप रहा आँखें बंद किये,
भाग्य ने दिया खाली-खप्पर, पर मैं ढूंढ रहा था मधुबाला ||९०||

शाम सिमटने लगी, नहीं थमा चाय का भी प्याला,
फिर भी मन आंधी सा उड़ता रहा, हो उस पर मतवाला ,
देहरी पर दस्तक सुन मैं दौड़ा, शायद लौटा हो मेरा प्यार,
मैं निर्निमेष देखता रहा देहरी, वहां खड़ी थी मधुबाला ||९१||

थकी हुई, कुछ डरी सी थी, धूप में जैसे तड़का प्याला,
गौरी बन झट उर पर लेटी, उछल पड़ा शिव भोला-भाला,
थकान मिटी, पर कहती काया से, यह कैसा अनुभव था मेरा,
क्या कहूँ, तुम खिली फूल सी, पर भ्रमर न देखा मधुबाला ||९२||

जब आँख खुली तो, पास रखा था रस का प्याला,
मीठा हो या फीका, आज तो छलका तन-मन से हाला,
खुश थे बहुत हम दोनों, साधन जो मिला जीने का धनी,
करेंगे फिर नया प्रयास अब, तुम्हे साथ लिए मधुबाला ||९३||

क्षणदा सी स्वर्ग भेद कर, भर गई वह मधु का प्याला,
देहरी पार संध्या हो चली ,कब रुका है कोई जानेवाला,
लालायित आँखों से उसे देखता रहा, मैं हर्ष-विकंपित सा,
सपने आज हुए फिर मतवाले, आना तुम फिर मधुबाला ||९४||

सुबह निकलती और दिन ढले लौटती मेरी सुरबाला,
रात थकी वह पिरोती सपनों में प्यार की माला,
आती कभी-कभी मुझ तक, निबटा कर अपना काम वहां,
पर मैं छत पर टंगा, तुम्हारी बाँट जोहता रहता मधुबाला ||९५||

एक दुपहरी कोई आहट हुई, छूटा हाथ से निवाला,
सर पर सूरज, धूप उगल रही थी तपती ज्वाला,
झट सांकल खोली मैंने, कोई आड़ खड़ा था मुँह ढांके,
पल में प्रकट हुई फिर, घर अन्दर थी मधुबाला ||९६||

स्वर्ग से उतरी सीधी, कैसे पूछूँ तुम्हारा दुःख बाला,
दर्द हो रहा था पेट में, पीठ भी हुआ पीड़ा में काला,
टूटी खाट संवार दी मैंने, उस पर लेटी वह मुस्कान लिए,
मैं पास ही बैठा रहा, सहलाते बाल तुम्हारे मधुबाला ||९७||

लेटी थी वह निशब्द यहाँ, पर झरता रहा मधु का प्याला,
मैं चित्र उतारता मन में, उसके अधरों को रंग डाला,
कभी सहलाता उसे, कभी खेलता कानों की बाली,
अब चाय बना लाया हूँ, अधरों से छू लो मधुबाला ||९८||

तुम रह गई आज यहाँ, तो समय हुआ सुखवाला,
अब न जाओ कहीं, पहन लें यहीं फूलों की माला,
और नहीं सहती दूरियां, घर चलें या देहरी कानून की,
उतावला हूँ मैं तो, सोचना तुम होकर तन्मय मधुबाला ||९९||

मैं भी साथ हो लिया उसके, बन सहयात्री मतवाला,
हम नित जाते दूर, साथ बैठते लिए चाय का प्याला,
यह आदत सी हो गई अब, हम दोनों के बीच,
हम चल लिए बरस भर, वसंत से सर्दियों तक मधुबाला ||१००||

तीन मास और बीते पर मिला चैन न सोनेवाला,
अब प्रतिदिन मिल लेते, बाँट लेते मधु का प्याला,
काश हम भी विहग होते, बस जाते सुखी किसी बरगद,
अब और प्रयत्न चाहिए, तुम साथ मेरा देना मधुबाला ||१०१||

अस्सी का दशक उठा, वसंत ने फिर रंग डाला,
समय दौड़ रहा था, हम चलते रहे लिए पांव में छाला,
मैंने भी आवेदन किया, होती नियुक्ति तो छंटता कोहरा,
बहुत मांगीं मिन्नतें पर, अब भाग्य तुम्हारा है मधुबाला ||१०२||

आज खुश थे हम, हथेलियों पर नाम भी लिख डाला,
दोपहर को काम निबटा, हमने एक बाग़ में डेरा डाला,
देख रहा था मैं जीवन, उसकी गोद में लेटा,
सोचता छोटा सा घर होगा, और वहां मेरी मधुबाला ||१०३||

मन किया कि चढ़ा दूँ, देवी सी प्रतिमा पर माला,
मनु की कल्पना से भी परे थी वह सुन्दर सुरबाला,
छांव पड़ी, वह झुकी, छू गया क्षीर-बिंदु हथेली से,
लगे फूलों के बाण मन्मथ को, फ़ेंक रही थी मधुबाला ||१०४||

हम लौटे सोचते, कैसे भर लें फिर से प्याला,
कितना मधु बहा आज, फिर भी मन तरसे हाला,
अब माया बनी बयार, मधु महका सांसों में दिन-रात,
प्यार जिया है मैंने थोडा, कब साथ जियेंगे मधुबाला ||१०५||

समय ने ली छोटी करवट, नीड़ दूर था बरगद वाला,
धूप में भी रंग बदल, उड़ता बादल हुआ काला,
कील गड़ी जांघ में, और दाने उभरे चेहरे पर मेरे,
कुछ अनहोनी कुछ होनी, दोनों साथ हुए मधुबाला ||१०६||

आई वह कल देखने मुझे, भर गयी फिर मधु-प्याला,
कुछ कैसे कर पाती, लगा था होंठों पर जो ताला,
शरीर तपने लगा था, अब तो घर जाना निश्चित था,
आज रात तुमसे दूर मन बहुत रोया मधुबाला, ||१०७||

निर्वासित सा मैं, स्मृतियों की पिरोता रहा माला,
काया तो शुद्ध हो गई, खुशियों पर मिट्टी डाला,
मैं ढूंढता रहा तुमसे अलग सूखी डालों पर नीड़ सघन,
पर कहीं नीड़ मिला है, कल बतलाता तुम्हे मधुबाला ||१०८||

तुम्हे बिना कहे चल पड़ा लिए हाथ में बरछी-भाला,
मैं जीवन से विक्षिप्त,अब किसी से न डरने वाला,
कह दिया बड़ों से सीना-ठोंक मेरे मन की अभिलाषा,
ग़दर से अब डरता नहीं, लक्ष्य तुम्ही हो मधुबाला ||१०९||

विराम हुआ यहाँ, गिर कर वहां फिर छलका मधु-प्याला,
आज साक्षात्कार हुआ मेरा, कुछ बनी बात भ्रम ऐसा पाला,
दुःख में भी सुख छिपा , देखा चमत्कार पहली बार ऐसा,
मुँह अँधेरे खिली सुबह, तुम बहुत याद आई मधुबाला ||११०||

शांत दोपहरी राजुल का पत्र, मन को फिर भिगो डाला,
मुझे पता था वह तुम हो, हर शब्द पीस कर पी डाला,
तुम छाई आँखों में जैसे श्रावणी इंद्रधनुष की आभा,
सबने तुम्हे यहाँ स्वीकारा, स्वागत है तुम्हारा मधुबाला ||१११||

कुछ और आन पड़ा, काम नहीं है टलने वाला,
शोध करना था, पर मन की व्यथा कौन है सुनने वाला,
अप्रत्याशित कुचल गया बैरागी, बस एक ही पत्र के तले,
करनीं हैं बहुत बातें कल तुमसे, अनुराग भरी मधुबाला ||११२||

दो मास बीत गए तुमसे दूर, सूखा मधु का प्याला,
अब तो मन तरस रहा, पीने अधरों की हाला,
आज नियुक्ति पत्र मिला, आषाढ़ के पहले पहुंचना था,
ईश्वर ने मेरी सुन ली, लो राह तय हुई मधुबाला ||११३||

लौट रहा हूँ कल मैं, दुःख सारे कुएं में डाला,
आना प्रिये तुम मिलने, अब खुला है छिपा उजियाला,
पहले कुछ और नहीं, बस तुम्हे देखना है जी भर के,
प्यासा हूँ तपती ज्येष्ठ में, करना मधु-वर्षा मधुबाला ||११४||

अथक दौड़ रहा मैं जैसे, समय ने जादू कर डाला,
छत से टंगा मैं, फिर भी धूप भी नहीं उर जलानेवाला,
कब से ताक रहा हूँ तुम्हे, है उत्सव आज हमारा,
कहना है बहुत कुछ तुमसे, आड़ नहीं अब मधुबाला ||११५||

दूर तिपहिये में दिखी वह, दौड़ा लिए मैं स्वागत माला,
वह स्वप्न भी, जागरण भी, सत्य जैसे मंदिर की ज्वाला,
देखता ही रहा उसे मैं, जैसे मिली सुमुखी कोई बरसों में,
बना लो आज सजीव हर पल, अम्बुज अधरों से मधुबाला |११६||

गिने नहीं कितनी बार अधरों ने मन रंग डाला,
उँगलियाँ विश्वास में उलझीं, आँखों ने देखा कल आनेवाला,
गोद में सर रख लेटी, उसे चाँद सा निहारता रहा,
अब मैं भी नियुक्त हुआ, इतना ही कह पाया मधुबाला, ||११७||

उसके बालों को सहलाता मैंने बीता सारा जग ढाला,
उंगलिया पीछे छोड़ गयी छाप, हटा कान का बाला,
कारण मिला जग-कहने, और हमें संबंध जोड़ने का,
दोनों हाथों कुबेर मिला,पर लक्ष्मी तुम ही हो मधुबाला ||११८||

दिन लौटा, लौटे पंछी, पिरो एक तार में माला,
उड़ना हमें भी है, अब समय नहीं ठहरनेवाला,
लक्ष्य मिला, दिशा मिली, अब डरना कैसा झंझावात से,
शंखनाद कर दो कल, पहन ढाल तुम मधुबाला ||११९||

छन-छन करता था मन, कैसे बचेगा स्वप्न-भरा प्याला,
मन करता, हम ही दौड़ पड़ें घरों में लिए हाथ में माला,
आख़िर तह से उठी समस्या, वह जो थी मंझली घर में,
देहरी से पाँव उठे पर, हुई पार नहीं मधुबाला ||१२०||

साम-दम-दंड-भेद, कुछ न तोड़ सका प्याला,
सुसके चेहरे घूर रहे थे, डाले अधरों पर ताला,
घर का आकाश भर गया, छाये गरजते काले बादल,
पर मन ऐरावत सा हिला नहीं, शचि थी मेरी मधुबाला ||१२१||

बात उड़ गयी, बातों की जैसे बन गयी हाला,
क्या हुआ, रचा भाग्य ने जैसा, कल वैसा ही आनेवाला,
हे ईश्वर शक्ति देना, जीवन अभी भी नहीं है अपना,
मैंने कहा तुम फिर मिलो तो, कुछ बात बनेगी मधुबाला ||१२२||

मुख भींचे मौन रहना, समय है राह दिखानेवाला,
आंसूं बहा नहीं बहेंगें हम, मन में है ऐसा लोहा ढाला,
सांत्वना देता रहा उसे, पर उसकी भी प्रतिज्ञा दृढ थी,
मिलूंगा मैं सबसे, बस साथ मेरा देना तुम मधुबाला ||१२३||

जब छाता घना अँधियारा, कहीं गगन में होता उजियाला,
हम भी निकल जायेंगे, किसी राह गर्व से सुरबाला,
मुझे जाना था कल, मिली नौकरी में बन ओह्देवाला,
धैर्य बनाये रखना, मैं लौटूंगा साथ तुम्हारे मधुबाला ||१२४||

सारी रात नींद नहीं आई, आँखों तले गहराया काला,
आंधी चली, टूटे पल्लव, झुका बरगद का डाला,
मैं विजन में संवार रहा था खोया कंचन चमकीला,
आगे बढ़ बात करूँगा मैं, अपने परिणय की मधुबाला ||१२५||

एक मास बीत गया, सूख गया मधु-भरा प्याला,
मन उफना तुम्हे देखने, फूंक उठी उर की ज्वाला,
लिए प्रस्ताव, पौ फटते बस लेकर उन तक पहुंचा,
मैंने कर ली पैरवी अपनी, तर्क तुम भी देना मधुबाला ||१२६||

सोचा था मैंने कुछ कोहराम मचेगा, टूटेगा कोई प्याला,
पर बात सतयुग सी हुई, हंस कर मुँह मीठा कर डाला,
हुआ नहीं विश्वास, सच क्या था और कितना भ्रम मैंने पाला,
पर मन तो मक्खन सा निथरा, तुम जैसा ही मधुबाला ||१२७||

पत्र लिख रहा हूँ तुम्हे, जैसे मोतियों की गुंथी माला,
कल बीता हर आयाम, विस्तार से तुम्हे कह डाला,
मेंढकों की चिल्लाहट में, कुछ भूला तो कहूँगा मिल कर,
घर भी भेजा पत्र, बातें साफ़ आसमान सी हैं मधुबाला ||१२८||

हटकर चट्टानों से ढूंढ लें विकल्प दूसरी सड़क वाला,
अनुदेश मिला लांघ जाएँ देहरी, नहीं किसी ने आड़े डाला,
मैं अवकाश ले आता हूँ, तुम्हारे घर मांगने हाथ तुम्हारा,
प्रश्न है अब देहरी का, मुझे थामे लांघ लेना मधुबाला ||१२९||

सारी रात फटी आँखों में, दौड़ते आसमान को ढाला,
सुबह दूर से सड़क पर, चल रहा था आशाओं को पाला,
मैं तुम्हारे घर पहुंचा, पारिजात तले तुम आई मुस्कुराती,
पग अन्दर तो बढ़े, पर जाने कैसे लौटेंगे मधुबाला ||१३०||

वही पुराना कोलाहल, देहरी पर टूटा विष का प्याला,
बड़ी-मंझली पर तर्क-वितर्क, फूंकी फिर मन की ज्वाला,
बरामदे पर अचेत हुए हम, पर मन की चेतना शेष रही,
हमने ढूँढ ली पगडंडी, लांघ देहरी चल पड़ी मधुबाला ||१३१||

तपता उर, ठंडी काया, क्रोधित मन , सब कैसे भर डाला,
निकल पड़े क्वांर की धूप में, छोड़ दुपट्टा वहीं घरवाला,
मैंने आज विश्वरूप देखा है, तुम ही विष्णु, नंदिनी मेरी,
सुनो, जीवन मुडती सरिता सी, कट कर पत्थरों से मधुबाला ||१३२||

संसृति की विधा यही है, रात तोड़ होता उजियाला,
दुपहरी मोहर लगी कागजों पर, टूटा जग का भ्रम-ताला,
मुहूर्त भी मिल गया, फिर रात निकल पड़ा मैं ढूंढता सूरज,
घर गुत्थियाँ उलझीं, संवाद उठे, पर निर्णय तय था मधुबाला ||१३३||

जीत भी थकी मिली, घरवालों ने फिर पार सम्हाला,
बात बड़ों की हुई, फीके सुख में मिठास भर डाला,
पंचांग पढ़े, परिणय के दिन निकले, कुछ समझौतों से,
अब तैय्यारी करनी थी, जीने की साथ तुम्हारे मधुबाला ||१३४||

मैं आँखें मूँदे सोच रहा था, उस दिन कैसी होगी सुरबाला,
जब अधरों पर रंग चढ़ेगा, उठेगी कुंड से मोहक ज्वाला,
मैं दौड़ा घनश्याम, खरीदने साड़ियाँ मनभावन,
साहब सा सूट भी लिया, तुमने जैसा कहा मधुबाला ||१३५||

आंसुओं पर सहस्त्र चुम्बन, चटक गया आँखों का प्याला,
बनेगा विश्व हमारा अब, जैसे सपनों में तुमने ढाला,
मेरे तो मुट्ठी भर प्रियजन, तुम्हारा तो सारा गाँव प्रिये,
इतने लोगों के समक्ष तुम्हे, मैं अपना कह सकूँगा मधुबाला ||१३६||

दुर्गा सी आँखों के ऊपर, लाल बूंदों की माला,
उर तक ऊंची, गोल सुमुखी, सजी जैसे सुरबाला,
दावानल सी लग रही थी, लाल आंचल से झांकती पलाश,
कोमल पग भरती थामे सहबाला, पास खड़ी थी मधुबाला ||१३७||

उसे देख आज मन गहराया, हास-उमंग भर उलीचा प्याला,
ऊपर देव, तले मित्र-बंधुओं ने, देखा शचि पर डलती जयमाला,
भाग्य उल्का सा टूटा, मांग लिया उससे हमने जीवन सारा,
तुम शाम्भवी, मिटा दी दुःख सारे, बनी उत्कर्षिणी मेरी मधुबाला ||१३८||

तुम न होती तो हर आंसू होता श्रावण सा बहनेवाला,
बरसतीं बूँदें सुख की, जब काल-सबल होता है रोनेवाला,
कल्याणी बन दिखा रही हो, तुम हँसती मुद्रा मुख की,
तुम सबसे लड़ी भावनी बन, नमन तुम्हे चित्रा मधुबाला ||१३९||

तुम ही अनंता,यह जीवन तुम्हे समर्पित कर डाला,
जब जग रूठा तुमने ही किया दीप तले उजियाला,
सुरसुन्दरी, विश्व में तुम ही हो,जिसने अभिलाषाओं को जीता,
संसृति से उभरी शशि सी धवल, कामाक्षी सी हो तुम मधुबाला ||१४०||

साथ हो तुम फिर भी, तुम्हारी तृष्णा में घिरा मैं सुरबाला,
पहले धूप से उभरता था, अब होगा तुम्हारे मधु से छाला,
भाग्य में उलझा मैं शून्य से उठा, तुमसे अंकों का आभास मिला,
अब तो बनेगा मुरब्बा, अधरों का जीवन भर मधुबाला ||१४१||

जीवन-सूत्र बंधा, शांत हुआ हवन, छलका मधु-लिप्त प्याला,
हलचल दबी दुपहरी की, संध्या मचली छूने तारों की माला,
आज अंतर में बसने, विदा हुई वह सुनती वीणा की धुन पुरानी,
छोटा हो या टूटा हो,यह घर तुम्हारा है मधुबाला ||१४२||

चढ़ती रात में फूलों के आसन पर खुली नयी शाला,
प्रणय-पाठ की प्रथम पंक्ति,पढ़े तोड़ अधरों का ताला,
सन्नाटा चीर झींगुर के बीच, कहीं चिकुर जाल में उलझा मूषक,
टपका मधु श्यामल अधरों से, यही सृष्टि है मधुबाला ||१४३||

रात की मिठास लिए नव-प्रभात हुआ भोला-भाला,
तुम्हे देखता ही रहा मैं, हाथ में थामे चाय का प्याला,
जीवन तो तुम ही हो, फिर भी ढूंढनी है दिशा नयी,
मधु छलकाते चलना अब, साथ मेरे तुम मधुबाला ||१४४||

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