मधुज्वाल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 8

मधुज्वाल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 8

उस हरी दूब के ऊपर

उस हरी दूब के ऊपर
छाया जो बादल सुंदर,
वह बरस पड़ा अब झर झर,
वह चला गया हँस-रोकर!
अह, भरा हुआ यह जीवन
ज्यों अश्रु भरा सावन घन,
साक़ी के मधु अधरों पर
झर झर हो जाय निछावर!

मनुज कुछ, धन में जिनके प्राण

मनुज कुछ, धन में जिनके प्राण,
जिन्हें निज नृप कुल का अभिमान!
उमर कुछ वे, जो विद्यावान,
चाहते यश पूजन सम्मान!
व्यक्ति ऐसे भी, जिनका ध्यान
स्वर्ग पर, करते जप तप दान,
हटेगा आँखों से व्यवधान,
सभी ये सुरा विमुख, अज्ञान!

जिसके प्रति अपनाव

जिसके प्रति अपनाव
वही अपना ख़ैयाम!
जिसमें है दुर्भाव
ग़ैर है उसका नाम!

विष दे जीवन दान
सुधा वह बने ललाम,
मधु अहि-दंश समान
न विस्मृति दे यदि जाम!

 यदि तेरा अंचल वाहक

यदि तेरा अंचल वाहक
मैं भी बन सकता, प्रियतम!
भर देती उर घावों को
तेरी करुणा की मरहम!

उस निस्तल मधु सागर से
पीते जिससे जड़ चेतन,
साक़ी, मैं भी पा जाता
तब एक बूँद उर मादन!

इस पल पल की पीड़ा का

इस पल पल की पीड़ा का
कह, मोल कहाँ है, साक़ी!
यह स्वर्ग मर्त्य से बढ़कर
अनमोल दवा है, साक़ी!
भर दे फिर उर का प्याला
छबि की हाला से सुन्दर,
जग के देशों से उसका
है एक बूँद श्रेयस्कर!
अपनी चिर उन्मद चितवन
तू फेर इधर को क्षण भर,
तेरे ये निस्तल लोचन
पृथ्वी नभ से भी दुस्तर!
इस घुल घुल कर मिटने की
चिर गूढ़ कथा है, साक़ी!
यह स्वर्ग मर्त्य से बढ़कर
अनमोल व्यथा है, साक़ी!

वह प्याला भर साक़ी सुंदर

वह प्याला भर साक़ी सुंदर,
मज्जित हो विस्मृति में अंतर,
धन्य उमर वह, तेरे मुख की
लाली पर जो सतत निछावर!
जिस नभ में तेरा निवास
पद रेणु कणों से वहाँ निरंतर
तेरी छबि की मदिरा पीकर
घूमा करते कोटि दिवाकर!

पान करना या करना प्यार

पान करना या करना प्यार
उमर यदि हो अपराध,
साधुवर, क्षमा करो, स्वीकार
न मुझको वाद विवाद!
करो तुम जप पूजन उपचार,
नवाओ प्रभु को माथ;
सुरा ही मुझे सिद्धि साकार,
मधुर साक़ी हो साथ!

अंबर फिर फिर क्या करता स्थिर

अंबर फिर फिर क्या करता स्थिर,
यह चिर अविदित!
छीन स्वप्न सुख, देता क्यों दुख
वह सब को नित!
बीते युग-क्षण करते चिन्तन
स्थिर न हुआ चित,
किया क्या उमर, गँवा दी उमर,
रहा अनिश्चित!

हुआ इस जग में ऐसा कौन

हुआ इस जग में ऐसा कौन
विषय रस किया न जिसने पान?
मिला ऐसा निर्मल न स्वभाव
रहा अघ से जो चिर अनजान!
अगर हों वृद्ध उमर में दोष
न साक़ी, करना उस पर रोष!
घात के प्रति करना आघात
तुम्हारा रहा न कभी विधान!

अगर साक़ी, तेरा पागल

अगर साक़ी, तेरा पागल
न हो तुझमें तन्मय, तल्लीन,
उमर वह मृत्यु दंड के योग्य
भले हो वह मंसूर नवीन!
सुरा पीकर हो वह विस्मृत,
भजन पूजन में हो कि प्रवीण,
नहीं वह दया क्षमा के योग्य
भक्ति श्रद्धा से यदि वह हीन!

स्नेहमय हुआ हृदय का दीप

स्नेहमय हुआ हृदय का दीप
प्रिया की रूप शिखा धर मौन!
प्रेम के हित दे निज बलिदान
नहीं जी उठा सखे, वह कौन?
दीप का करना यदि गुण गान,
शलभ से कहो, जिसे अपनाव;
उमर यह है निगूढ़ कुछ बात,
जलों पर पड़ता अधिक प्रभाव!

उमर क्यों मृषा स्वर्ग की तृषा

उमर क्यों मृषा स्वर्ग की तृषा?
कल्पना मात्र शून्य अपवर्ग,
धरा पर ही यह जीवन स्वर्ग!
स्वर्ग का नूर सुरा, प्रिय हूर,
सुरा सुंदरी यहाँ कब दूर?
गान, मधु पान पात्र भरपूर!
हरित वन तीर, तरंगित नीर,
सुरा अंगूरी, मदिर समीर,
सखे, हाला भर, हृदय अधीर!

 

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