मधुज्वाल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 11

मधुज्वाल -सुमित्रानंदन पंत -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sumitranandan Pant Part 11

उमर दिवस निशि काल और दिशि

उमर दिवस निशि काल और दिशि
रहे एक सम, जब कि न थे हम!
फिरता था नभ सूर्य चंद्र प्रभ,
देख मुग्ध छवि गाते थे कवि!
चंद्र वदनि की सी अलकावलि
लहराती थी लोल शैवलिनि!
कोमल चंचल धरणी श्यामल
किसी मृग नयनि की थी दृग कनि!

छूट जावें जब तन से प्राण

छूट जावें जब तन से प्राण
सुरा में मुझे कराना स्नान!
सुरा, साक़ी, प्याली का नाम
सुनाना मुझे उमर अविराम!
खोजना चाहे कोई भूल
मुझे मेरे मरने के बाद,
पांथशाला की सूँघे धूल,
दिलाएगी वह मेरी याद!

अधर घट में भर मधु मुस्कान

अधर घट में भर मधु मुस्कान
मूर्ति बोली, ‘ऐ निष्ठावान,
तुझे क्यों भाया यह उपचार-
भजन, पूजन, दीपन, शृंगार!’
भक्त बोला, ‘जिसने अनजान
दिए हम दोनों को दो रूप,
उसी ने मुझे उपासक, प्राण!
बनाया तुम्हें उपास्य अनूप!

तुम ऋतुपति प्रिय सुघर कुसुम चय

तुम ऋतुपति प्रिय सुघर कुसुम चय
हम कंटक गण!
स्वाति स्वप्न सम मुक्ता निरुपम
तुम, हम हिम-कण!

निठुर नियति छल हो कि कर्म फल
यह चिर अविदित,
चख मदिरा रस, हँस रे परवश,
त्याग हिताहित!

यहाँ नीलिमा हँसती निर्मल

यहाँ नीलिमा हँसती निर्मल,
कँपता हरित तृणों का अंचल,
गाता फेन ग्रथित जल कल कल!
अरे त्याग तप संयम में रत!
किस मिथ्या ममता हित ये व्रत?
यह विराग क्यों भग्न मनोरथ?
बंकिम दृग, रक्तिम मदिराधर,
यह सुरांगना सुरा मनोहर
तुझे बुलाती, इसे अंक भर!
कौन जानता, क्या होगा फिर,
सुरा फेन सा जीवन अस्थिर,
पी रे मदिरा का यौवन चिर!’

सुनहले फूलों से रच अंग

सुनहले फूलों से रच अंग
सलज लाला सा मुख सुकुमार,
सुरा घट सा दे मादक रंग
शिखर तरु सा उन्नत आकार!
न जाने तुमने क्यों, करतार,
भरी प्राणों में तरुण उमंग,
बुना क्यों स्वप्न मधुर संसार
हृदय सर में भर मदिर तरंग!
रचे जो मुरझाने को फूल,
तड़पने को बुलबुल का प्यार,
उमर मदिराधर रस में भूल
न क्यों तब दे सब शोक बिसार!

इस जीवन का भेद

इस जीवन का भेद
जिसे मिल गया गभीर अपार,
रहा न उसको क्लेद
मरण भी बना स्वर्ग का द्वार!
करले आत्म विकास,
खोज पथ, जब तक दीपक हाथ,
मरने बाद, निराश,
छोड़ देगा प्रकाश भी साथ!

फेन ग्रथित जल, हरित शष्प दल

फेन ग्रथित जल, हरित शष्प दल,
जिससे सरित पुलिन आलिंगित,
उस पर मत चल, वह चिर कोमल
ललना की रोमावलि पुलकित!
गुल लाला सम मुख छबि निरुपम
उस मृग नयनी की थी सस्मित,
वह मुकुलित तन आज धूलि बन
हुआ कूल दूर्वादल मंडित!

हृदय जो सदय, प्रणय आगार

हृदय जो सदय, प्रणय आगार,
भक्त, उस उर पर कर अधिकार!
न मंदिर मसजिद के जा द्वार
न जड़ काबे पर तन मन वार!
अगर ईश्वर को कुछ स्वीकार
हृदय जो सदय, प्रणय आगार!
हृदय पर यदि न तुझे अधिकार
भक्त, पी अमर प्रणय मधु धार!

 

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