मणिकर्णिका-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh 

मणिकर्णिका-बांग्ला कविता(अनुवाद हिन्दी में) -शंख घोष -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Shankha Ghosh

 

चतुर्दशी के अंधकार में बह रही है गंगा
उसके ऊपर हमारी पाल वाली नाव की साँसें
हमारे चेहरों से टकरा रही थी
मणिकर्णिका की आभा

हम किसी के भी चेहरे की ओर नहीं देख रहे थे
केवल हाथ से डेक को छू रहे थे
पानी की दो-एक बूँदों का
माथे पर लग रहा था तिलक

दिन के समय जिसे देखा था चांडाल
रात को वही हमारा माझी था
उनकी आँखों की पुतलियों में
किसी तरह का भेद नहीं था

पानी पर उड़ती आ रही थी चिनगारियाँ
भस्म घुलती जा रही थी हवा में
पंजर के भीतर डुबकी लगा रहा थे ऊदबिलाव
अब हम
दक्षिण में हरिश्चंद्र घाट की ओर
घुमा लंेगे नाव
दोनों ओर दिखाई दे रहे हैं
कालू डोम के घर

चतुर्दशी के अंधकार में बह रही है गंगा
एक श्मशान से दूसरे श्मशान जाते हुए
हम किसी के भी चेहरे की ओर नहीं देख रहे थे।

 

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