मख़दूम की याद में-2-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

मख़दूम की याद में-2-शामे-श्हरे-यारां -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

“याद का फिर कोई दरवाज़ा खुला आख़िरे-शब”
दिल में बिख़री कोई ख़ुशबू-ए-क़बा आख़िरे-शब

सुब्‍ह फूटी तो वो पहलू से उठा आख़िरे-शब
वो जो इक उम्र से आया न गया आख़िरे-शब

चाँद से माँद सितारों ने कहा आख़िरे-शब
कौन करता है वफ़ा अहदे-वफ़ा आख़िरे-शब

लम्से-जानाना लिए, मस्ती-ए-पैमाना लिए
हम्दे-बारी को उठे दस्ते-दुआ आख़िरे-शब

घर जो वीराँ था सरे-शाम वो कैसे-कैसे
फ़ुरक़ते-यार ने आबाद किया आख़िरे-शब

जिस अदा से कोई आया था कभी अव्वले-सुब्‍ह
“उसी अंदाज़ से चल बादे-सबा आख़िरे-शब”

मास्को, अक्तूबर, 1978

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