मंत्र-गंध और भाषा-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta 

मंत्र-गंध और भाषा-कविता-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

कौन विश्वास करेगा कि
फूल भी मंत्र होता है?

मैं अपने चारों ओर
एक भाषा का अनुभव करता हूँ।
जो ग्रंथों में नहीं होती
पर
जिसमें फूलों की-सी गंध
और बिल्वपत्र की-सी पवित्रता है,
इसीलिए मंत्र
केवल ग्रंथों में ही नहीं होते।

धरती को कहीं से छुओ
एक ऋचा की प्रतीति होती है।
देवदारुओं की देह-यष्टि
क्या उपनिषदीय नहीं लगती?
तुम्हें नहीं लगता कि
इन भोजपत्रों में
एक वैदिकता है
जिसका साक्षात् नहीं किया गया है?
ये प्रपात
स्तोत्र-पाठ ही तो करते हैं।
यह कैसी वैश्वानरी-गंध
गायत्री छंदों में
धूप के पग धरती
वनस्पतियों पर उतर रही है।
सावित्रियों के इस अरण्य-रास का वर्णन
किसी शतपथ में नहीं मिलेगा।

इसीलिए मैं एक भाषा का अनुभव करता हूँ
जो ग्रंथों में नहीं होती
पर प्रायः जिसे मैंने
भाषाहीन वनस्पतियों में सुना है।

मैंने इस भूमि को जब भी देखा है
गायत्री ही देखा है।
कभी नदियों को उनके एकांत में देखो—
औषधियों का आचमन करती हैं।
पेड़ों के फलों।
गायों के दूध, और
मनुष्य मात्र की दृष्टि
किसी को भी सूँघो—
सूर्य की सुगंध मिलेगी।
कहीं भी जाओ
एक संपूर्ण अनुष्टुप
इस पृथिवी पर लिखा मिलेगा।

इसीलिए मैं एक भाषा का अनुभव करता हूँ
जो ग्रंथों में नहीं होती
पर प्रायः जिसे मैंने
एकांत और कोलाहलों में सुना है।
रात और दिन के कृष्ण-शुक्ल स्वरों में
ये सूर्याएँ
यजुर्वेद हो जाती हैं।
प्रत्येक क्षण एक मंत्र
वनस्पति में परिणत होता है
जिसकी गंध
फूल मात्र में होती है।
नाम, सीमा का होता है
असीम का नहीं,
तब भला उस गंध को क्या नाम दोगे
जो फूल मात्र में होती है?
हमारी सारी भाषाओं से परे
वह एक साक्षात् है
जो केवल एकांत की मंत्र-गंध होता है
और वह केवल अवतरित होता है।

इसीलिए मैं एक भाषा का अनुभव करता हूँ
जो ग्रंथों में नहीं होती
क्योंकि उनमें फूल, मंत्र नहीं होता,
जबकि कौन विश्वास करेगा कि
फूल भी मंत्र होता है,
क्योंकि फूल
एक शब्द ही नहीं संपूर्ण भाषा है।

 

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