भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे शब्द ,भक्त धन्ना जी, Hindi Poetry,हिंदी कविता ,Hindi Poem , Hindi Kavita, Bhakt Dhanna Ji,

भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे शब्द ,भक्त धन्ना जी, Hindi Poetry,हिंदी कविता ,Hindi Poem , Hindi Kavita, Bhakt Dhanna Ji,

भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे ॥
लालच बिखु काम लुबध राता मनि बिसरे प्रभ हीरे ॥१॥ रहाउ ॥
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे चार बिचार न जानिआ ॥
गुन ते प्रीति बढी अन भांती जनम मरन फिरि तानिआ ॥१॥
जुगति जानि नही रिदै निवासी जलत जाल जम फंध परे ॥
बिखु फल संचि भरे मन ऐसे परम पुरख प्रभ मन बिसरे ॥२॥
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ धिआनु मानु मन एक मए ॥
प्रेम भगति मानी सुखु जानिआ त्रिपति अघाने मुकति भए ॥३॥
जोति समाइ समानी जा कै अछली प्रभु पहिचानिआ ॥
धंनै धनु पाइआ धरणीधरु मिलि जन संत समानिआ ॥४॥१॥੪੮੭॥

Leave a Reply