भोर के छोर पर-तूस की आग-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

भोर के छोर पर-तूस की आग-भवानी प्रसाद मिश्र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bhawani Prasad Mishra

 

भोर के छोर पर
मैंने तुम्हें देखा नहीं
सुना

सुना तुम्हारा स्वर
और देखा भी स्वर को
लहर कर पास आते हुए

तुम मगर दूर
होते जा रहे थे शायद
भोर के छोर से भी

और तभी उगा
शुक्र का तारा
आसमान में ऐसा कि

सिमटा तुम्हारा रूप
और स्वरूप आसमान का
और शुक्र के तारे का
तुग्हारे गान में

मैं देखता रह गया
तुम्हारे गान को
सुबह से शाम तक के
आसमान को

स्वर के रूप के बल पर
सुबह से शाम तक की
धूप के बल पर
भर लिया सब कुछ
प्राणों में भूल कर
अपने ही भीतर की ध्वनियां !

 

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