भूदान-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

भूदान-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

कौन टोकता है शंका से ? चुप रह, चुप, अपलापी !
क्रिया-हीन चिन्तन के अनुचर, केवल ज्ञान-प्रलापी !
नहीं देखता, ज्योति जगत् में नूतन उभर रही है ?
गाँधी की चोटी से गंगा आगे उतर रही है ।
अंधकार फट गया, विनोबा में धर कर आकार
घूम-घूम वेदना देश की घर-घर रही पुकार ।

ओ सिकता में चंचु गाड़ कर सुख से सोनेवालो !
चिंताएँ सब डाल भाग्य पर निर्भय होनेवालो !
पहुँच गई है घड़ी, फैसला अब करना ही होगा,
दो में एक राह पर पगले ! पग धरना ही होगा ।
गाँधी की लो शरण, बदल डालो मिलकर संसार ।
या फिर रहो कल्कि के हाथों कटने को तैयार ।

अपने को ही नहीं देख, टूक, ध्यान इधर भी देना,
भूमि-हीन कृषकों की कितनी बड़ी खड़ी है सेना ।
बाँध तोड़ जिस रोज फौज खुलकर हल्ला बोलेगी,
तुम दोगे क्या चीज ? वही जो चाहेगी, सो लेगी ।
“कृष्ण दूत बनकर आया है, सन्धि करो सम्राट ।
मच जायेगा प्रलय, कहीं वामन हो पड़ा विराट ।

पहचानो, यह कौन द्वार पर अधनंगा आया है,
किस कारण अधिकार स्वयं बन भिखमंगा आया है,
समझ सको यदि मर्म, बुलाये बिना दौड़ कर आओ,
जो समझो तुम अंश अपर का उसे स्वयं दे जाओ ।
स्वत्व छीन कर क्रान्ति छोड़ती कठिनाई से प्राण ।
बडी कृपा उसकी, भारत में माँग रही वह दान ।

(१९५२ ई०)

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