भूचालनामा-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

भूचालनामा-कविता-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

भूचाल का जो हक़ ने यह नक़्शा दिखा दिया।
कु़दरत का अपनी ज़ोर जहां की दिखा दिया॥
रोशन दिलों के नूर नज़र को बढ़ा दिया।
ग़फ़लत ज़दों को मार के ठोकर जगा दिया॥
दरियाओ,, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥1॥

जिन मुन्किरों को नूह के तूफां का शुबह था।
और दोजख़ो बहिश्त समझे है तोतिया॥
क़ायल न कब्र के थे न ख़तरा था हश्र का।
इस जलज़ले ने सबके दिये वसवसे मिटा॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥2॥

सन् बारह सौ अठारह में यह वारदात थी।
अव्वल जमादी बारहवीं तारीख सात थी॥
दिन बुध का जुमेरात की वह आधी रात थी।
भूचाल क्या था कु़दरते हक़ की यह बात थी॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥3॥

थी आधी रात जो हुआ भूचाल का गुज़र।
पत्ता सा थर थरा गया पत्ताल का जिगर॥
सातों तबक़ के दिल गए सकान सर बसर।
दर बोले अल हफ़ीज तो दीवारें अल हज़र॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥4॥

अजज़ाए अर्ज़ क़ाफले ताक़ाफ़ हिल पड़े।
अजगर अटल अचल के कलेजे उबल पड़े॥
इंसा घरों में दश्त में वहशी निकल पड़े।
तायर भी आशयानों में अपने उछल पड़े॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥5॥

गढ़, कोट, किला, रूए ज़मीं पर दहल गए।
कांपने लगीं बुर्ज, कंगूरे भी हिल गए॥
संगीं मकां महल जो बने थे उसल गए।
ईंटों के ज़ोहरे फट पड़े पत्थर पिघल गए॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥6॥

बाहम किवाड़ गिर पड़े जं़जीर हिल गईं।
कड़ियां कड़क कड़क के छतों से निकल गईं॥
छज्जे सुतून कांपे, मुंडेरे दहल गईं।
दीवारें झूम झूम के पंखें सी झल गईं॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥7॥

घर-घर में शोर हो गया, और गुल गली गली।
रूए ज़मीं पे पड़ गई एकदम में खलबली॥
कोई अल्लाह-अल्लाह कह उठा, कोई राम-राम जी।
कोई हुसैन कह उठा, कोई अली-अली॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥8॥

लरजे़ में आके डालियां नख़्लों की हिल गईं।
दहशत से चल बिचल हो, जड़ें भी कुचल गईं॥
थर्रा के माहो माही की चूलें उसल गईं।
जल, थल के होश उड़ गए, रेखें निकल गईं॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥9॥

जो अर्ज़ सब जहां में बोझों के तई सहे।
जब वह थर थराईं तो फिर हम कहां रहे॥
जिन्नात, देव, शेर, शुतर, फ़ील, अज़दहे।
इक हूं में सबके तनके ग़रज खिल गए चहे॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥10॥

कु़दरत की तेग़ की है यक कुछ आबे दरदरी।
खिंचते ही सबके पड़ गई सीनों में थर थरी॥
दाराई काम आई न कुछ यहां सिकन्दरी।
इक दम में थरथरा गई सब खु़श्की और तरी॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥11॥

भूचाल की धमक का वह सुनते ही कड़कड़ा।
जी धक से तन में हो गया और दम निकल चला॥
औरों के दिल की क्या कहूं! जाने वही खु़दा।
पर मैं तो जाना सूरे इस्राफ़ील फुक गया॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥12॥

आंखों से मेरे उस घड़ी आंसू अ़जब चले।
गुज़रा यह जी में हाय! हुआ क्या! ग़जब चले॥
तहतुस्सरा की सैर को हम सबके सब चले।
दिल में यही यक़ीन हुआ यानी अब चले॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥13॥

हैबत के मारे पहले तो दिल हो गया दो नीम।
जब थम गया तो हो गया वह वहीं मुस्तक़ीम॥
यह कु़दरतों की देख के शाने उमीदों वीम।
सर को झुका के मैंने कहा वहीं या करीम॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥14॥

भूचाल में कहां था यह नक़्शा मजाल का।
सब हुक्म था यह हज़रते एज़दताल का॥
इक पल में यों बढ़ा दिया शोला जलाल का।
इक दम में फिर घटा दिया नक़्शा ख़याल का॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥15॥

भूचाल का तो कहने की ख़ातिर ही नाम था।
यह ज़ोर शोर और भी कु़दरत का काम था॥
अहकाम जुल मिनन का जहां अहतिमाम था।
यह ज़लज़ला वहां का एक अदना गुलाम था॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥16॥

थीं जितनी-जितनी अस्ल ज़मीं की रसाइयां।
इक ज़लज़ले ने सबको पकड़ के हिलाइयां॥
भूचाल ने यह जैसी हवाऐं दिखाइयां।
ऐसी हज़ारों उसकी हैं कु़दरत नुमाइयां॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥17॥

दस्ते क़ज़ा की उंगली की छोटी यह पोर है।
हिलने से जिसके कांपा हर इक मार मोर है॥
भूचाल का तो यारो यह अदना सा शोर है।
सौ दर्जे उससे उसकी तो कु़दरत में ज़ोर है॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥18॥

जैसा कि उसके हुक़्म से आया था ज़लज़ला।
कांपी तमाम रूए ज़मीं जिस से थर थरा॥
ऐसा ही गर वह हुक़्म से अपने न रोकता।
फिर कुछ न था जहां में फ़क़त पानी-पानी था॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥19॥

भूचाल के तो हमको खयालातो ख़ाम थे।
यह छोड़ने, यह रोकने कु़दरत के काम थे॥
था डौल तो वही कि न ख़ासो आम थे।
रहम आ गया बग़रना वहीं सब तमाम थे॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥20॥

सिजदा करो खुदा के तई यारो दम बदम।
आखि़र करीम था, तो किया उसने फिर करम॥
बाक़ी तो कुछ रहा न था फिर थम गए कदम।
वर्ना अभी घड़ी में फिर न तुम थे न हम॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥21॥

भूचाल क्या वह चाहे तो इक पल के मारते।
कर डाले आसमानो ज़मीं को उपर तले॥
उड़ने लगे पहाड़ रुई की तरह पड़े।
क़ादिर क़दीर दम में जो चाहे सो कुछ करे॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥22॥

कहते हैं यों हकीम कि फिरती है सब हवा।
आता है उससे रूए ज़मीं पर यह ज़लज़ला॥
ख़ालिक का भेद ही यह किसी पर नहीं खुला।
हम तो उसी के हुक़्म का जाने हैं दबदबा॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥23॥

महकूम सब हैं उसके ही हाकिम वही इलाह॥
ताबे हैं जिसके रम्ज़ के माही से ताब माह॥
जब उसका हुक़्म आवे तो हो कौन सद्दे राह।
क्या हुक़्म है अज़ीज़ो ज़रा देखो वाह! वाह!॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥24॥

हाकिम वही, हकीम वही, हक़ वही, कबीर।
ख़ालिक़ वही, खु़दा वही, दाता वही ख़बीर॥
मालिक वही, मलिक वही, क़ादिर वही, क़दीर।
कु़दरत का उसकी एक करिश्मा था ऐ “नज़ीर”॥
दरियाओ, कोह, शहरो, जंगल सब हिला दिया।
एक आन में हिला दिया और फिर थँबा दिया॥25॥

 

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