भूख।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

भूख।-राही चल : अनिल मिश्र प्रहरी (Anil Mishra Prahari)| Hindi Poem | Hindi Kavita,

भूख- भूख यह भूख उदर में
ज्वाला जब फैलाती,
बाँध मनुज को बाहु- पाश में
कहाँ नहीं ले जाती।

दो – रोटी का खेल जगत् में
खेल रहे सब प्राणी,
अपनी -अपनी भूख लिए
नित करते खींचातानी।

करता है नर कृत्य जिसे
वह नहीं स्वप्न में देखा,
भूख बदल देती हाथों की
गहरी, उलझी रेखा।

क्षुधा बना देती है कृश तन
मन हारा मतवाला,
माँग रहे शिशु भीख नगर में
ले हाथों में प्याला।

खाते हैं दर -दर की ठोकर
अपनी भूख मिटाने,
हाथ पसारे विकल घूमते
मिलें अगर दो – दाने।

बिलख रहे भूखे बच्चों की
होगी भूख मिटानी,
शिक्षा का अधिकार दिला
देना उनको बेमानी।

 

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