भुस का पुतला-युगधारा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

भुस का पुतला-युगधारा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

फैलाकर टांग
उठाकर बाहें
अकड़कर खड़ा हुआ
भुस भरा पुतला

कर रहा है निगरानी
ककड़ी तरबूज की
खीरा खरबूज की
सो रहा होगा अपाहिज
मालिक घर में निश्चिंत हो

खेत के नगीच
कोई मत आना
हाथ मत लगाना
प्रान जो प्रिय है तो
भुस का पुतला, खांस रहा खो खो खो
अहल भोर
गया था डोल – डाल
खेत की हिफाजत का देखा जब ये हाल
हंस पड़ा भभाकर में
यह भागी लोमड़ी,
वह भागी लोमड़ी,
सर, सर सर सर,
खर, खर, खर, खर.
दूर का फासला,
चट कर गई पार कर

अकेले हंसा में ठहाका मार कर
मेरे कहकहे पर हो गया नाराज
फटे पुराने कुर्ते से ढका
भुस का पुतला
दप दप उजला
सरग था

ऊपरनीचे था पाताल
अपच के मारे बुरा था हाल
दिल दिमाग भुस का

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