भीष्मों को ललकार रहें हैं-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh 

भीष्मों को ललकार रहें हैं-कविता-रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rameshwar Nath Mishra Anurodh

 

भीष्मों को ललकार रहे हैं देखो आज शिखंडी ।
मक्कारों के क्रय – विक्रय की सजी हुई है मंडी ।।
उछल रहे हैं बहस के लिए जिनने हँसकर पाया –
पुरस्कार, सम्मान-समादर, धन दौलत, पद, माया ।
लोकतंत्र तो आज बन रहा शरणस्थल चोरों का,
गद्दारों की कुलकरनी का, झूठे, मुँहजोरों का ।
जो गुलाम के हैं गुलाम वे लामबंद हो कहते –
“हमें लाज लगती है अब तो इस भारत में रहते ।”
उनका कहना -“देश नहीं है रहने लायक यारो !
चारों ओर अराजकता है, केवल काटो – मारो ।।
हिटलरशाही आज देश में, घोर कष्ट है फैला ।
शाम-दाम से शत्रु को नहीं सकोगे जीत ।
अगर जीतना शत्रु को अपनाओ विपरीत ।।
शाम नीति से शत्रु कब होता है भयभीत?
चिकनाई हटती नहीं पानी से हे मीत!
दंड-भेद की नीति भी बड़ी जरूरी तात!
रुद्ध हुआ करता सदा इससे ही उत्पात ।

 

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