भाव-नगर से अर्थ-नगर में-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

भाव-नगर से अर्थ-नगर में-वंशीवट सूना है -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

चलते चलते पहुँच गए हम
भाव-नगर से अर्थ-नगर में
जाने कितने और मोड़ हैं
जीवन के अनजान सफर में।

नहीं ज़िन्दगी रही ज़िन्दगी
शब्दों की दूकान हो गई,
ख़ुद पर आए शर्म हमें
मंज़िल इतनी आसान हो गई
अपने ही हाथों से हमने
आग लगा दी अपने घर में
चलते-चलते पहुँच गए हम ॥

मोती के लालच मेँ हमने
सिर्फ़ बटोरे कंकड़-पत्थर
हमेँ डूबना था आँसू में
डूबे हम फूलों में जाकर
हम ऐसे लुट गए कि जैसे
डोली लुट जाए पीहर में।
चलते-चलते पहुँच गए हम ॥

एक समय वह भी था जब
पूरे गुलशन में हम ही हम थे
गीत हमारे ही गुलाब थे
अश्क हमारे ही शबनम थे
है यश का पैबन्द सिर्फ़ अब
जीवन की मैली चादर में ।
चलते-चलते पहुँच गए हम ॥

आँसू के बाग़ों में जिसने
जाकर बोये गीत-रुबाई,
सिक्कों की धुन पर अब नाचे
उसके ही सुर की शहनाई।
सुबह गुज़ारी थी सतजुग में
शाम गुज़रती है द्वापर में
चलते-चलते पहुँच गए हम ॥

एक मोड़ था जिसने हमको
गीतों का श्रृंगार बनाया
दूजा है ये मोड़ कि जिसने
कविता को अख़बार बनाया,
मगर तीसरा मोड़ कहां है
देखूँगा आख़िरी पहर में।
चलते-चलते पहुँच गए हम
भाव-नगर से अर्थ-नगर में

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