भावी पीढ़ी से-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

भावी पीढ़ी से-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

हम तुम में साकार नहीं तो छिपे हुए हैं।
तुम भी लेकर नाव हमारे उष्ण रुधिर में
घूम रहे इच्छाओं की दुनिया टटोलते,
ले जाने को उसे, तत्त्व जो अविनश्वर है,
जा सकता है जो कुम्हलाये विना वहाँ तक
जहाँ पहुँच तट छोड़ तुम्हें ऊपर आना है ।

ये कुछ भीगे कमल और ये गीली कलियाँ ?
ऐसी ही थीं, हम सब की ईजाद नहीं हैं ।
जो हम को दे गये, उन्होंने भी पाया था,
अपने पूर्व-पुरुष के हाथों से ऐसा ही।
जीत वही जो मनु के चरणों में लोटी थी;
हार वही जिसके नीचे वह काँप उठा था।
रहे धूल में पड़ा कि गंगा में नहलाओ,
आदम का बेटा आदम का ही बेटा है ।

नयी बात क्या कहें ? नया हमने क्या सीखा?
उलट-पुलट कर शब्द खेल जितने दिखलायें;
किन्तु, बात है यही कि जल ठंढा होता है,
और आग पर चढा उसे जितना खौलाओ,
किन्तु, आग उस पानी से भी बुझ जाती है ।

जिज्ञासा का धुआँ उठा जो मनु के सिर से,
सब के माथे से वह उठता ही आया है,
घटी-बढ़ी, पर, नहीं तनिक नीलिमा गगन की,
और न बरसा समाधान कोई अम्बर से ।

श्रम है केवल सार, काम करना अच्छा है,
चिंता है दुख-भार, सोचना पागलपन है ।
पियो सोम या चाय, नाम में जो अन्तर हो,
मगर, स्वाद का हाल वही खट्टा-मीठा है ।

(१९५१ ई०)

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