भारत-व्रत-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

भारत-व्रत-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

 भारत-व्रत

(सन् 1955 ई. में रुसी नेतओं के दिल्ली-आगमन
के अवसर पर विरचित)

स्वागत लोहित सूर्य ! यहाँ निर्मल, नीलाभ गगन है,
क्षीर-कल्प सर-सरित, अगुरु-सौरभ से भरित पवन है ।
लेकर नूतन-जन्म पुरातन व्रत हम साध रहे हैं,
युग की नींव क्षमा, करुणा, मुदिता पर बाँध रहे हैं।

खोज रहे वह उत्स जहाँ से पयस्विनी छूटी थी,
अभयदायिनी, शुभ्र अहिंसा की धारा फूटी थी ।
वह निसर्ग-शुचि मन्त्र, धर्म-जाग्रत जिससे जन-मन हो,
बिना छुए विष को विष की ज्वाला का स्वयं शमन हो ।

वह पथ, जिस पर चले मनुजता प्रेरित स्वयं हृदय से,
आलोकित निज पुण्य प्रभा से, दीपित आत्मोदय से ।
लोभ-द्रोह-छल-छद्म-कलुष-कालिमा प्राण की धोकर
पहुंचे हम उस दिव्य लोक में मनुज पूर्ण विध होकर-

जहाँ नहीं शम-दम-बन्धन हैं, जहां नहीं शासन है,
समता की शीतल छाया में जहाँ सुखी जन-जन है ।
शान्ति-लोक वह, जहाँ आणविक बम न कभी फूटेंगे,
कालमृत्यु बन मनुज मानवों पर न जहाँ टूटेंगे ।

लक्ष्य टूर है, औ’ विकास धीमे-धीमे चलता है,
इस विशाल तरु में फल सदियों बिना नहीं फलता है ।
अगम साधना की घाटी यह और मनुज दुर्बल है,
किन्तु बुद्ध, गाँधी, अशोक का साथ न कम सम्बल है ।

अनेकान्त है सत्य, जिसे तुम खोज रहे भुजबल में,
उसी सत्य को ढूँढ रहे हम अपने अंतस्तल में ।
जिस देवी के लिए तुम्हारे कर में जवा-कुसुम है,
अर्पित उसी शक्ति को भारत का अक्षत-कुंकुम है ।

अक्षत, जवा, विजय जिसकी हो, जय है मानवता की,
जय है शान्ति, सुधा, मैत्री की, करुणा की, समता की ।
शान्ति, सुधा, मैत्री, करुणा-ये पत्थर नहीं, पवन हैं,
देह नहीं मानती, उन्हें जानता मनुज का मन है ।

जय हो लोहित भानु ! मुक्त मानस का शुभ्र गगन है,
स्वागतार्थ अर्पित भारत का अक्षत है, चन्दन है।
जग में जो भी सखा शान्ति का, भारत का अपना है
साधन भिन्न भले, हम दोनों का अभिन्न सपना है ।

यह सपना साकार बनेगा भय के प्रक्षालन से,
यह सपना साकार बनेगा पंचशील-पालन से ।
स्वप्न सत्य होगा, प्रमाण है सह-अस्तित्व हमारा,
अर्पित जग के हेतु शान्ति-कामी व्यक्तित्व हमारा ।

जय हो लोहित भानु ! विश्व में यदि सर्वत्र अनल है,
तो ले जाओ, अभी यहाँ बाकी गंगा का जल है ।
यह जल, यह पीयूष दाह जन-मन का हरनेवाला,
ज्वालामुखी कंठ में कोकिल, का स्वर भरनेवाला ।

छिड़को इसे फणी के फण पर, उठती ज्वालाओं पर,
ज्ञान-ग्रीव में पड़ी आणविक बम की मालाओं पर ।
कभी इसी जल से मनुष्य के मन का दाह धुलेगा,
खुला नहीं जो असि से, फूलों से वह द्वार खुलेगा ।
(नई दिल्ली, 16 नवम्बर, 1955 ई.)

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