भाग्य-राजकुमार जैन राजन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajkumar Jain Rajan

भाग्य-राजकुमार जैन राजन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajkumar Jain Rajan

जिंदगी
खण्ड- खण्ड होती
संस्कृति की चित्कार
फैलने लगता है भीतर ही भीतर
ज्वालामुखी

कीचड़ में धँसते जा रहे
रथ के पहिये को
कर्ण द्वारा निकालने का प्रयत्न
जैसे दोहराया जा रहा हो
फिर से
पुरुषत्व का दस्तावेज

चक्रव्यूह के सातवें द्वार में
उलझे- जूझते
अभिमन्यु-सी स्थिति है
या सम्मोहन के आवेश में
लिपटा
एक भयावह सच
अपना वजूद फैला रहा है
और हम
मूक दर्शक बने हुए हैं

मील के पत्थर
हजारों गिन चुका हूं
क्रूर विपदाओं के आक्रोश में
मेरा टूटता बिखरता व्यक्तित्व
समय के तनावों को भोग रहा है
जीवन ऐसे ही चक्रवात में फंसा है

अस्फूट स्वर…
भावना कब मनुज को
मुक्ति देगी
जिंदगी की मृच्छकटिका
कौन जाने कब रुकेगी

भाग्य पटकता है
पछाड़ता है बार-बार
और हरबार अपनी दृढ़ता में
खड़ा हो जाता हूँ
शरशैय्या से बिंधे भीष्म-सा।

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