भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु ॥
दूत लगे फिरि चाकरी सतिगुर का वेसाहु ॥
कलप तिआगी बादि है सचा वेपरवाहु ॥१॥
मन रे सचु मिलै भउ जाइ ॥
भै बिनु निरभउ किउ थीऐ गुरमुखि सबदि समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
केता आखणु आखीऐ आखणि तोटि न होइ ॥
मंगण वाले केतड़े दाता एको सोइ ॥
जिस के जीअ पराण है मनि वसिऐ सुखु होइ ॥२॥
जगु सुपना बाजी बनी खिन महि खेलु खेलाइ ॥
संजोगी मिलि एकसे विजोगी उठि जाइ ॥
जो तिसु भाणा सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥३॥
गुरमुखि वसतु वेसाहीऐ सचु वखरु सचु रासि ॥
जिनी सचु वणंजिआ गुर पूरे साबासि ॥
नानक वसतु पछाणसी सचु सउदा जिसु पासि ॥४॥११॥(18)॥

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