भजन-1-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

भजन-1-सूफ़ियाना कलाम -नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

ऐ मन हित रख और न दूजा रंग बजावै।
मुख ते ले हरिनाम ज़रा मुहचंग बजावै।
तुरत सरंगी की छेड़ गुनी का ढंग बजावै।
धुर की धुन का ध्यान धरे और पंग बजावै।
नेह नून ले संग अरे आ-चंग बजावै।
भजन बरन पहिचान पिया मिरदंग बजावै॥

छिन छिन का रख मान अरे एक छिन मत भूले।
पल पल जगतें ठान अरे मन दिन मत भूले।
धनक धनक हो आन अरे धन धन मत भूले।
गत गत का परमान अरे गुन गुन मत भूले॥ नेह नून.

जिन चित घुंघरू बाँध सतेहा ताल लगाया।
हित और मन के साथ मंजीरा आन बजाया।
सुध बुध तबले ठोंक झनक कर ताल मिलाया।
ऐ मन मेरी मान भजन का भेद बताया॥ नेह नून.

जाको है टफक ग्यान तंबूरा कंठ लगाया।
धनक धनक जब ताल बजा तब मन लुभियाना।
तान मिलाया बाजे से जब ठहरा गाना।
मान मेरा दिस्टान अरे टुक होकर स्याना॥ नेह नून.

ढोलक डोरी खींच पुरे पर थाप लगाई।
बोल निकाले गीत के और उसकी अस्थाई।
पेम पुरी में बसने को जब जगह पाई।
ऐ मन मेरे बात यही है छानी ताई। नेह नून.

ध्यान मुंडेलस बाँध ज्योंही टुक सर उकसाया।
हित की बीन बजाने में परबीन कहाया।
डम्मल तन में साध कै और छैना छमकाया।
ऐ मन मेरे सोच यही तुझको समझाया॥ नेह नून.

ढोल गले में चाहत का है जिसने डाला।
टेक उसी की चाली और जोराग निकाला।
तू भी जब मद पेम का ऐ मन पीकर प्याला।
कहना मान नज़ीर का अब होकर मतवाला।
नेह नून ले संग अरे आ चंग बजावे।
भजन बरन पहिचान पिया मिरदंग बजावे॥

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