ब्रजभाषा लोकगीत होरी | ब्रजभाषा लोकगीत होली -1

ब्रजभाषा लोकगीत होरी | ब्रजभाषा लोकगीत होली -1

अरी पकड़ौ री ब्रजनार

अरी पकड़ौ री ब्रजनार,
कन्हैया होरी खेलन आयो है,
होरी खेलन आयो है, होरी खेलन आयो है, अरी पकड़ौ री ——-

संग में हैं उत्पाती बाल,
ऐंठ के चले अदा की चाल,
हाथ पिचकारी फेंट गुलाल
कमोरी, कमोरी रंगन की भर लायो है, अरी पकड़ौ री ——–

डारो मुख ऊपर रंग आज,
एक भी सखा जाय नहीं भाज,
लाज को होरी में क्या काज,
बड़े भागन से, बड़े भागन से फागुन आयो है, अरी पकड़ौ री ———

दई आज्ञा वृषभानु-दुलारी,
सब मिल पकड़ो कृष्ण मुरारी,
सखिन सब हल्ला खूब मचायो है, अरी पकड़ौ री ——–

पीताम्बर मुरली लई छिनाय,
श्याम को गोपी भेस बनाय,
राधा-रानी मन्द-मन्द मुसकाय,
श्याम को घूँघट मार नचायो है, अरी पकड़ौ री ———

अरी होली में हो गया झगड़ा

अरी होली में हो गया झगड़ा, सखियों ने मोहन को पकड़ा ।

धावा बोल दिया गिरधारी
नन्द गाँव के ग्वाले भारी
तक-तक मार रहे पिचकारी
आँख बचाकर कुछ सखियों ने, झट से मोहन पकड़ा ॥ अरी होली में ——-

सखियों के संग भानुदुलारी
ले गुलाल की मुट्ठी भारी
मार रहीं हो गई अँधियारी
दीखे कुछ नहीं तब भी, सखियों ने मोहन को पकड़ा ॥ अरी होली में ——-

सखा-भेष सखियों ने धारा
सब ने मिल के बादल फाड़ा
जाय अचानक फंदा डाला
छैला को कस कर जकड़ा, सखियों ने मोहन पकड़ा ॥ अरी होली में ——-

आई-आई रे होली

आई-आई रे होली, खेलो फाग बीच बरसाने में।
पीली-पीली गुरनारी
रंग भर पिचकारी
देखो मुख पे है मारी
भीगी अंगिया है सारी
आई-आई रे ——–

मुख मलो है गुलाल
नाचें दै-दै के ताल
भीज गए नंदलाल
हँसैँ सारे गोपी-ग्वाल
आई-आई रे ——–

नहीं करत ठिठोली
खा के भाँग की गोली
हम मस्तों की टोली
आज खेले नई होली
आई-आई रे ——–

(बाँके बिहारी ने भर पिचकारी,
आज मेरी ओर मारी,
मोरी भीज गई सारी,
मेरी चुनरी बिगारी,
सास देगी मोहे गारी,
कहाँ-से आई दइमारी,
मैं तो लाज की मारी घर कैसे मैं जाऊँ,
कछु समझ न पाऊँ,
सखी रंग लै के आऊँ ऐसी होरी खिलाऊँ,
या के पीछे पड़ जाऊँ,
कारे से गोरो बनाऊँ।)

और महीनों में बरसे–न-बरसे

(होली के मस्ती और चुहल भरे गीतों के विपरीत
यह एक शांत रस का अति मधुर गीत है जो सभी
को लुभाता है। यहाँ गायिका समस्त देवी-देवताओं
सहित बच्चे से लेकर 80 बरस के वृद्ध तक पर रंगो
से रस टपकने की कामना करती हुई जब अंत में
कहती है: जय बंसी वाले की, जय बंसी वाले की हम
हू पे बरसे, तो हर कोई बरबस मुस्करा देता है)

और महीनों में बरसे–न-बरसे, फागुनवा में रस रंग-रंग बरसे ।

कान्हा पे बरसे, और राधा पे बरसे
संग-संग !!!! ओ-हो संग-संग सब गोप-गोपिन पे बरसे ॥ फागुनवा में —-

राम जी पे बरसे, और सीता जी पे बरसे
संग-संग !!!! ओ-हो संग-संग प्यारे हनुमत जी पे बरसे ॥ फागुनवा में —-

शिव जी पे बरसे, और गौरा जी पे बरसे
संग-संग !!!! ओ-हो संग-संग प्यारे गणपति पे बरसे ॥ फागुनवा में —-

विष्णु जी पे बरसे, और लक्ष्मी जी पे बरसे
संग-संग में शेषनाग पे बरसे ॥ फागुनवा में ——

ब्रह्मा जी पे बरसे, गायत्री जी पे बरसे
संग-संग !!!! ओ-हो संग-संग में चारों वेदों पे बरसे ॥ फागुनवा में ——

मथुरा पे बरसे, वृन्दावन पे बरसे
संग-संग !!!! ओ-हो संग-संग में बरसाने पे बरसे ॥ फागुनवा में —-

बच्चों पे बरसे, जवानों पे बरसे
उन पे भी !!! ओ हो उन पे भी बरसे जो अस्सी बरस के ॥ फागुनवा में —-

इन पे भी बरसे, और उन पे भी बरसे
जय बंसी वाले की !!!! जय बंसी वाले की हम हू पे बरसे ॥ फागुनवा में —-

 कान्हा तुझे ही बुलाय गई

कान्हा तुझे ही बुलाय गई नथ वाली, कान्हा तोहे ही ।
मुझे काहे को बुलाय गई नथ वाली, मोहे काहे को ?
होली खेलन को बुलाय गई नथ वाली, होली खेलन को ।

उस नथ वाली का रूप बताय दे,
बड़े–बड़े नैना कजरा वाली, कान्हा तोहे ही ।

उस नथ वाली का रंग बताय दे,
गोरा-गोरा रंग चटक साड़ी, कान्हा तोहे ही ।

उस नथ वाली का गाँव बताय दे,
बरसाना गाँव बताय गई, कान्हा तोहे ही ।
उस नथ वाली का नाम बताय दे,
राधा नाम बताय गई, कान्हा तोहे ही ।
कान्हा तुझे ही बुलाय गई नथ वाली, कान्हा तोहे ही ।

कान्हा पिचकारी मत मार

कान्हा पिचकारी मत मार, चूनर रंग-बिरंगी होय ।

चूनर नई हमारी प्यारे
हे मनमोहन बंसी वारे
इतनी सुन ले नन्द-दुलारे
पूछेगी वह सास हमारी, कहाँ से लीनी भिगोय ॥ कान्हा पिचकारी —–

सबका ढंग हुआ मतवाला
दुखदाई त्योहार निराला
हा-हा करतीं हम ब्रजबाला
राह हमारी अब न रोक रे मैं समझाऊँ तोय ॥ कान्हा पिचकारी ——

मार दीनी रंग की पिचकारी
हँस-हँस कर रसिया बनवारी
भीग गईं सारी ब्रजनारी
राधा ने हरि का पीतांबर खींचा मद में खोय ॥ कान्हा पिचकारी ——

 कान्हा पिचकारी मत मारे

कान्हा पिचकारी मत मारे, मेरे घर सास लड़ेगी रे
सास लड़ेगी रे, मेरे घर नन्द लड़ेगी रे ॥ कान्हा पिचकारी ——

सास डुकरिया मेरी बड़ी खोटी, गारी दे, ना देगी रोटी
द्योरानी-जिठानी मेरी जनम की दुश्मन, सुबह करेंगी रे ॥ कान्हा पिचकारी ——

जा-जा झूठ पिया से बोले, एक की चार, चार की सोलह
ननद बिजुलिया जाय पिया के कान भरेगी रे ॥ कान्हा पिचकारी ——

कुछ नहीं बिगड़े श्याम तुम्हारा, मुझे होएगा देश-निकाला
ब्रज की नारी दे ताली, मेरी हँसी करेंगी रे ॥ कान्हा पिचकारी ——

हा-हा खाऊँ पड़ूँ तोरी पइयाँ, डालो श्याम मती गलबहियाँ
नाजुक मोतिन की माला मेरी टूट पड़ेगी रे ॥ कान्हा पिचकारी ——

कन्हैया घर चलो गुँइया

कन्हैया घर चलो गुँइया, आज खेलें होली कन्हैया घर।

अपने-अपने भवन से निकरीं, कोई सांवल कोई गोरी,
एक-से-एक जबर मदमाती, सोलह बरस की छोरी, कन्हैया घर —–

बंसी बजावत, मन को लुभावत, ऐसो मंत्र पढ़ो री,
सास-ननद से चोरी-चोरी, निकर पड़ीं सब गोरी, कन्हैया घर ——

कोई लचकत कोई मटकत आवत, कोई छुप-छुप चोरी-चोरी,
कोई चपला सी चपल चाल, कोई झिझकत बदन मरोरी, कन्हैया घर ——–

अबिर गुलाल अगर और चन्दन, केसर भर पिचकारी,
श्यामसुंदर संग होरी खेलें, होना हो सो हो री। कन्हैया घर ——–

खेलें मसाने में होरी दिगम्बर

खेलें मसाने में होरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।
भूत-पिसाच बटोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।

गोप न गोपी न श्याम न राधा
ना कोई रोक न कोई बाधा
ना कोई साजन न गोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।

लख सुन्दर फागुनी छटा के
मन से रंग गुलाल हटा के
चिता-भस्म भर झोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।

नाचत-गावत डमरूधारी
भाँग पिलावत गौरा प्यारी (छोड़ें सर्प गरुड़ पिचकारी)
पीटें प्रेत ढपोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।

भूतनाथ की मंगल होरी
देख-देख के रीझें गौरी
धन्य-धन्य नाथ अघोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी, हो!!!!री ।

चैत महिनवा पिया परदेस में

चैत महिनवा पिया परदेस में,
जियरा में हूक उठे मोरे रामा, चैत महिनवा।
को बिन सूनी लागे, अंबुआ की डारी,
को बिन सूनों, जियरा हो रामा, चैत महिनवा।
कोयल बिन सूनी, अंबुआ की डारी,
पी बिन सूनों, जियरा हो रामा, चैत महिनवा।
को बिन सूनो लागे, गेंदा को फुलवा,
को बिन सूनों, जियरा हो रामा, चैत महिनवा।
भौंरा बिन सूनो, गेंदा को फुलवा,
पी बिन सूनों, जियरा हो रामा, चैत महिनवा।

 

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