बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद-ग़ज़ल-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद-ग़ज़ल-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

बे-सबब मुस्कुरा रहा है चाँद
कोई साज़िश छुपा रहा है चाँद

जाने किस की गली से निकला है
झेंपा झेंपा सा आ रहा है चाँद

कितना ग़ाज़ा लगाया है मुँह पर
धूल ही धूल उड़ा रहा है चाँद

कैसा बैठा है छुप के पत्तों में
बाग़बाँ को सता रहा है चाँद

सीधा-सादा उफ़ुक़ से निकला था
सर पे अब चढ़ता जा रहा है चाँद

छू के देखा तो गर्म था माथा
धूप में खेलता रहा है चाँद

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