बेला-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

बेला-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 2

बाहर मैं कर दिया गया हूँ

बाहर मैं कर दिया गया हूँ ।
भीतर, पर, भर दिया गया हूँ ।

ऊपर वह बर्फ गली है,
नीचे यह नदी चली है,
सख्त तने के ऊपर नर्म कली है;
इसी तरह हर दिया गया हूँ ।
बाहर मैं कर दिया गया हूँ ।

आंखों पर पानी है लाज का,
राग बजा अलग-अलग साज़ का,
भेद खुला सविता के किरण-व्याज का;
तभी सहज वर दिया गया हूं ।
बाहर मैं कर दिया गया हूँ ।

भीतर, बाहर; बाहर, भीतर;
देखा जब से, हुआ अनश्वर;
माया का साधन यह सस्वर;
ऐसे ही घर दिया गया हूं ।
बाहर मैं कर दिया गया हूँ ।

 लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो

लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो,
भरा दौंगरा उन्ही पर गिरा।
उन्ही बीजों को नये पर लगे,
उन्ही पौधों से नया रस झिरा।

उन्ही खेतों पर गये हल चले,
उन्ही माथों पर गये बल पड़े,
उन्ही पेड़ों पर नये फल फले,
जवानी फिरी जो पानी फिरा।

पुरवा हवा की नमी बढ़ी,
जूही के जहाँ की लड़ी कढ़ी,
सविता ने क्या कविता पढ़ी,
बदला है बादलों से सिरा।

जग के अपावन धुल गये,
ढेले गड़ने वाले थे घुल गये,
समता के दृग दोनों तुल गये,
तपता गगन घन से घिरा।

 बदलीं जो उनकी आँखें

बदलीं जो आँखें, इरादा बदल गया।
गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया।

यह टहनी से हवा की छेड़छाड़ थी, मगर
खिलकर सुगन्ध से किसी का दिल बहल गया।

ख़ामोश फ़तह पाने को रोका नहीं रुका,
मुश्किल मुकाम, ज़िन्दगी का जब सहल गया।

मैंने कला की पाटी ली है शेर के लिए,
दुनिया के गोलन्दाजों को देखा, दहल गया।

 

शुभ्र आनन्द आकाश पर छा गया

शुभ्र आनन्द आकाश पर छा गया,
रवि गा गया किरणगीत ।
श्वेत शत दल कमल के अमल खुल गये,
विहग-कुल-कंठ उपवीत ।

चरण की ध्वनि सुनी, सहज शंका गुनी,
छिप गये जंतु भयभीत ।
बालुका की चुनी पुरलुगी सुरधुनी;
हो गये नहाकर प्रीत ।

किरण की मालिका पड़ी तनुपालिका,
समीरण बहा समधीत ।
कंठ रत पाठ में, हाट में, बाट में;
खुल गया ग्रीष्म या शीत ।

 रूप की धारा के उस पार

रूप की धारा के उस पार
कभी धंसने भी दोगे मुझे ?
विश्व की शयामल स्नेहसंवार
हंसी हंसने भी दोगे मुझे ?

निखिल के कान बसे जो गान
टूटते हैं जिस ध्वनि से ध्यान,
देह की वीणा का वह मान
कभी कसने भी दोगे मुझे ?

शत्रुता से विश्वव है उदास;
करों के दल की छांह, सुवास
कली का मधु जैसा निस्त्रास
कभी फंसने भी दोगे मुझे ?

वैर यह ! बाधाओं से अंध !
प्रगति में दुर्गती का प्रतिबंध !
मधुर, उर से उर, जैसे गंध
कभी बसने भी दोगे मुझे ?

आँखे वे देखी हैं जब से

आँखे वे देखी हैं जब से,
और नहीं देखा कुछ तब से ।

देखे हैं कितने तारादल
सलिल-पलक के चञ्चल-चञ्चल,
निविड़ निशा में वन-कुन्तल-तल
फूलों की गन्ध से बसे ।

उषाकाल सागर के कूल से
उगता रवि देखा है भूल से;
संध्या को गिरि के पदमूल से
देखा भी क्या दबके-दबके !

सभाएँ सहस्रों अब तक की;
वैसी आँखें न कहीं देखीं;
उपमाओं की उपमाएँ दीं,
एक सही न हो सकी सबसे !

स्वर के सुमेरु हे झरझरकर

स्वर के सुमेरु हे झरझरकर
आये हैं शब्दों के शीकर ।

कर फैलाए थी डाल-डाल
मञ्जरित्त हो गयी लता-माल,
वन-जीवन में फैला सुकाल,
बढ़ता जाता है तरु-मर्मर ।

कानो में बतलाई चम्पा,
कमलों से खिली हुई पम्पा,
तट पर कामिनी कनक-कम्पा
भरती है रंगी हुई गागर ।

कलरव के गीत सरल शतशत
बहते हैं जिस नद में अविरत,
नाद की उसी वीणा से हत
होकर झंकृत हो जीवन-वर ।

 कैसे गाते हो ? मेरे प्राणों में

कैसे गाते हो ? मेरे प्राणों में
आते हो, जाते हो ।

स्वर के छा जाते हैं बादल,
गरज-गरज उठते हैं प्रतिपल;
तानों की बिजली के मण्डल
जगती तल को दिखलाते हो ।

ढह जाते हें शिखर, शिखरतल;
बह जाते हें तरु, तृण, वल्कल;
भर जाते हैं जल के कलकल;
ऐसे भी तुम बल खाते हो ।

लोग-बाग बैठे ही रह गये,
अपने में अपना सब कह गये,
सही छोर उनके जो गह गये, बार बार उन्हें गहाते हो ।

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