बेला-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 1

बेला-सूर्यकांत त्रिपाठी निराला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Suryakant Tripathi Nirala Part 1

 बीन की झंकार कैसी बस गयी मन में हमारे

बीन की झंकार कैसी बस गयी मन में हमारे ।
धुल गयीं आँखें जगत की, खुल गये रवि-चंद्र-तारे ।

शरत के पंकज सरोवर के हृदय के भाव जैसे
खिल गये हैं पंक से उठकर विमल विश्राव जैसे,
गन्धस्वर पीकर दिगन्तों से भ्रमर उन्मद पधारे ।

पवन के उर में भरा कम्पन प्रणय का मन्द गतिक्रम
कर रहा है समय जग को सुप्ति से जो हुआ निर्मम,
हारकर जन सकल जीते जीतकर जन सकल हारे ।

भर गयी विज्ञान माया, कर गयी आलोक छाया,
छुट गयी मिलकर हृदयधन से प्रिया की प्रकृत काया,
दिग्वधू ने दन्तियों के मलिनता-मद यथा झारे ।

नाथ, तुमने गहा हाथ, वीणा बजी

नाथ, तुमने गहा हाथ, वीणा बजी;
विश्व यह हो गया साथ, द्विविधा लजी ।

खुल गये डाल के फूल, रंग गये मुख
विहग के, धूल मग की हुई विमल सुख;
शरण में मरण का मिट गया महादुख;
मिला आनन्द पथ पाथ; ससृति सजी ।

जलभरे जलद जैसे गगन में चले,
अनिल अनुकूल होकर लगी है गले;
नमित जैसे पनस-आम-जामुन-फले,
स्नेह के सुने गुण-गाथ, माया तजी ।

खिला कमल, किरण पड़ी

खिला कमल, किरण पड़ी,
निखर-निखर गयी घड़ी ।

चुने डली में सुथरे
बडे-बड़े भरे-भरे,
गन्ध के गले संवरे;
जादू की आँख लड़ी ।

तारों में जीवन के
हार सुघर उपवन के,
फूल रश्मि के तन के,
यौवन की अमर कड़ी ।

विरह की भरी चितवन
करुण मधुर ज्योति-पतन,
क्षीण उर, अलख-लेखन
आँखें है बड़ी-बड़ी ।

बातें चलीं सारी रात तुम्हारी

बातें चलीं सारी रात तुम्हारी;
आंखें नहीं खुलीं प्रात तुम्हारी ।

पुरवाई के झोंके लगे हैं,
जादू के जीवन में आ जगे हैं,
पारस पास कि राग रंगे हैं,
कांपी सुकोमल गात तुम्हारी ।

अनजाने जग को बढ़ने की
अनपढ़-पड़े पाठ पढ़ने की
जगी सुरति चोटी चढ़ने की;
यौवन की बरसात तुम्हारी ।

आये पलक पर प्राण कि

आये पलक पर प्राण कि
बन्दनवार बने तुम ।
उमड़े हो कण्ठ के गान,
गले के हार बने तुम ।

देह की माया की जोत,
जीभ की सीप के मोती,
छन-छन और उदोत,
वसन्त-बहार बने तुम ।

दुपहर की घनी छांह,
धनी इक मेरे बानिक,
हाथ की पकडी बाँह,
सुरों के तार बने तुम ।

भीख के दिन-दूने दान,
कमल जल-कुल की कान के,
मेरे जिये के मान,
हिये के प्यार बने तुम ।

कुन्द-हास में अमन्द

कुन्द-हास में अमन्द
श्वेत गन्ध छाई ।
तान-तरल तारक-तनु
की अति सुघराई ।

तिमिर गहे हुए छोर
खिंची हुई तुहिन-कोर,
बन्दी है भानु भोर,
किरण मुरुकराई ।

पथिक की थकी चितवन
थिर होती है कुछ छन,
चलता है गहे गहन
पथ फिर दुखदायी ।

आते है पूजक-दल,
चुनते हैं फूल सजल,
भरती है ध्वनि से
कल बीथी, अमराई ।

साथ न होना

साथ न होना । गाँठ खुलेगी, छूटेगा उर का सोना ।
आँख पर चढ़े, कि लड़े, फिर लड़े;
जीवन के हुए और कोस कड़े;

प्राणों से हुआ हाथ धोना । साथ न होना है ।
गाँठ पड़ेगी, बरछी की तरह गड़ेगी;
मुरझाकर कली झड़ेगी ।

पाना ही होगा खोना । साथ न होना ।
हाथ बचा जा, कटने से माथ बचा जा,
अपने को सदा लचा जा;
सोच न कर मिला अगर कोना । साथ न होना ।

 फूलों के कुल काँटे, दल, बल

फूलों के कुल काँटे, दल, बल ।
कवलित जीवन की कला अकल ।

विष, असगुन, चिन्ता और सोच,
उकसाये , खाये बुरे लोच,
कर गये पोच से और पोच;
मुरझे तरु-जीवन के सम्बल ।

नीरस फल, मुरझाई डाली,
जलहीन, सजल लोचन माली;
पल्लव-ज्वाला उर की पाली,
सुर की वाणी फूटी उत्कल ।

 उठकर छवि मे आता है पल

उठकर छवि मे आता है पल
जीवन के उत्पल का उत्कल ।

वर्षा की छाया की मर्मर,
गुंजी गणिका; गणिका; भाव सुघर;
आशा की लम्बी पलकों पर
पुरवाई के झोंके प्रतिपल ।

पंकज के ईक्षण शरद हँसी;
भू-भाल शालि की बाल फंसी;
बह चला सलिल, खुल चली नसी;
सोझे दल इधर पसीजे फल ।

कुन्द के दुग्ध के नयन लुब्ध;
विपरीत, शीत के त्रास क्षुब्ध;
व्यय के, अर्जन के, अर्थ मुग्ध;
फूलों से फल, तरु से वल्कल ।

नैष्पत्रय गया, पल्लव-वसन्त
आया कि मुस्कराया दिगन्त;
यौवन की लाली भरी, हन्त,
किशलय की कल चितवन चलदल ।

खेती का, खलिहानों का, सुख
ग्रीष्म का खुला ज्योति से सुमुख,
आकां क्षा का कुसुमित किंशुक,
निर्मल मणिजल-सलिला निस्तल ।

हँसी के तार के होते हैं ये बहार के दिन

हँसी के तार के होते हैं ये बहार के दिन।
हृदय के हार के होते हैं ये बहार के दिन।

निगह रुकी कि केशरों की वेशिनी ने कहा,
सुगंध-भार के होते हैं ये बहार के दिन।

कहीं की बैठी हुई तितली पर जो आँख गई,
कहा, सिंगार के होते हैं ये बहार के दिन।

हवा चली, गले खुशबू लगी कि वे बोले,
समीर-सार के होते हैं ये बहार के दिन।

नवीनता की आँखें चार जो हुईं उनसे,
कहा कि प्यार के होते हैं ये बहार के दिन।

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