बेचैन हैं अब ख़ालसा -गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

बेचैन हैं अब ख़ालसा -गंज-ए-शहीदां -अल्लाह यार ख़ां -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Allah Yar Khan Jogi ,

बेचैन हैं अब ख़ालसा जी रंज के मारे ।
दिल पर ग़म-ओ-अन्दोह के चलने लगे आरे ।
ख़ामोश तड़पने लगे सतिगुर के प्यारे ।
जोगी जी कहो पंथ से अब फ़तह गुज़ारे ।
छाया हुआ दीवान पे अब ग़म का समां है ।
बस ख़तम शहीदों की शहादत का बयां है ।

बस्स एक हिन्द में तीर्थ है यातरा के लिये ।
कटाए बाप ने बच्चे जहां ख़ुदा के लिये ।

चमक है मेहर की चमकौर तेरे ज़र्रों में,
यहीं से बन के सतारे गए समा के लिये ।

गुरू गोबिन्द के लख़त-ए-जिगर अजीत जुझार,
फ़लक पि इक, यहां दो चांद हैं ज़िया के लिये ।

दक्कन में दूर मरकद है हज़ूर साहब का,
पहुंचना जिस जगह मुश्किल है मै-नवा के लिये ।

भटकते फिरते हैं क्यों हज्ज करें यहां आ कर,
येह काबा पास है हर एक खालसा के लिये ।

यहां वुह लेटे हैं, सतलुज ने जोश में आ कर,
चरन हज़ूर के नहरें बहा बहा के लिये ।

मिज़ार गंज-ए-शहीदां है उन शहीदों का,
फ़रिशते जिन की तरसते थे ख़ाक-ए-पा के लिये ।

उठाएं आंखों से आकर यहां की मट्टी को,
जो ख़ाक छानते फिरते हैं कीमीया के लिये ।

येह है वुह जा जहां चालीस तन शहीद हुए,
ख़ताब सरवरी सिंहों ने सर कटा के लिये ।

दिलाई पंथ को सर-बाज़ीयों ने सरदारी,
बराय कौम येह रुतबे लहू बहा के लिये ।

 

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