बून्द बून्द बरख पनारे बह चलै जलु-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

बून्द बून्द बरख पनारे बह चलै जलु-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

बून्द बून्द बरख पनारे बह चलै जलु
बहुर्यो उमगि बहै बीथी बीथी आइकै ।
ताते नोरा नोरा भरि चलत चतरकुंट
सरिता सरिता प्रति मिलत है जायकै ।
सरिता सकल जल प्रबल प्रवाह चलि
संगम समुन्द्र होत समत समायकै ।
जामै जैसीऐ समायी तैसीऐ महमा बडाई
ओछौ अउ गंभीर धीर बूझीऐ बुलायकै ॥३७२॥

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