बुलबुल और गुलाब-आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

बुलबुल और गुलाब-आसावरी-गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़ !

धूप से
गर्मी से
काँटों से,
हवा के गरम-गरम तेज़ सर्राटों से
दिन-भर यह लड़ा है,
झगड़ा है,
और अभी थक कर,
बहुत थक कर
शायद ग़श खाकर गिर पड़ा है ।
थकन इसे कुछ तो मिटाने दे,
तुझ को आलिंगन में जड़ सके,
और तेरे होठों पर चुम्बन का ताजमहल गढ़ सके,
इसकी भुजाओं में इतनी तो शक्ति आ जाने दे !
मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!
तेरी शरारत से सोये हुए घावों को ठेस लग सकती है,
नरम-नरम पातों में,
ठंडी-ठंडी डालों में आग दहक सकती है,
आवारा चाँद की
हरजाई नींद की आँख बहक सकती है,
क्योंकि प्यार सोये तो शीशा है,
जागे तो जादू है,
दर्द जब तक भीतर है वश में है,
बाहर बेक़ाबू है ।
ठंडे अंगारों का गाँव है यह
व्यर्थ चिनगारी ने यहाँ डाल,
हवा जो पत्तों के तकियों पर
सोने की कोशिश में करवट बदल रही है,
खुशबू जो पंखुरी की खिड़की से
दबे पाँव चोर जैसी चुप-चुप निकल रही है,
उन सब में उठा न असमय भूचाल !

मत छेड़ !
मत छेड़ !
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़ !

बुलबुल ! यह वह देश नहीं
जहाँ प्यार बेरोक किया जा सके,
मन भाये फूल को
आत्मा का अर्घ्य बेखौफ़ दिया जा सके ।
मिटूटी के अश्रु भरे नाटक में
सुख यहाँ केवल विष्कंभक है,
और आनन्द-
अरे वह तो मेहमान है,
भूले-भटके ही कभी आता है,
शाम आए तो सुबह वापिस चला जाता है,
यह केवल रोग है,
शौक है जो पास रह पाता है ।
और यहाँ प्यार-
अरे प्यार नहीं, सौदा है
उसकी दुकानें हैं
हाटें-बाज़ारें हैं
जिनमें वह कपड़ों के भाव मोल बिकता है,
चाँदी और सोने की उसकी तराजू में
आदमी से लेकर ईश्वर तक तुलता है ।
और यहाँ दिल दिल के बीच दीवारें हैं,
जाति-पाँति,
धर्म-कर्म,
रंग-वर्ण,
देश-काल वाली बड़ी ऊँची मीनारें हैँ।
उनको गिराना आसान कोई काम नहीं
वहाँ लगे बड़े-बड़े पहरे हैं
क्योंकि मठ-मस्जिद औ’ गिरजाघर
पंडित औ’ पादरीशेख और मौलवी
मज़हब के जितने भी ठेके-ठेकेदार हैं,
सब के सब इन्हीं के सहारे तो ठहरे हैं।
इन्हें लाँघ जाने की सज़ा मौत पाना है
ईसा की भाँति क्रास ऊपर चढ़ जाना है,
गांधी की तरह गोली खाकर मर जाना है।
मरण क्या तुझको स्वीकार है?
अर्थी उठाने को अपनी तैयार है?
नहीं! नहीं !
तो मत छेड़! मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल सोते गुलाब को मत छेड़!

दुखी क्यों होती उदास क्यों होती है!
प्यार गर प्यार है तो उसका हर आँसू एक मोती है,
मोती वह-
माँग जिसे भर कर
जवान यह बूढ़ी सृष्टि होती है ।
तूने जो मोती ढुलकाया
वह व्यर्थ नहीं जायेगा,
प्यार का मौसम इसी बगिया में आयेगा,
आयेगा नहीं तो वह-
आने को विवश किया जायेगा।
आज मगर दूसरी ही बात है,
कहने को बहुत कुछ तबियत है,
लेकिन यह देख कैसी काली-काली रात है।
कल की जो बात आज़ सुनेगी, डर जायेगी,
तेरी यह शानदार कलगी गिर जायेगी;
और फिर अंधेरे के कान भी…
बहुत सजग होते हैं
बहुत कुछ तो वे बिना कहे सुन लेते हैं,
इसीलिए चाँदनी का चुम्बन
सितारे बहुत धीरे से लेते हैँ।
लेकिन तू चुम्बन…नहीं-
जा आज लौट जा
गीतों की शहज़ादी!
अपने ही गीतों के गाँवों को लौट जा।
तब यहाँ आना जब
किसी भी बगिया के आस-पास
कोई भी न घेरा हो,
कोई भी न मेढ़ हो,
कोई न दीवार हो,
हर पौधा हँसता हो, जगता हो,
सब पर बहार हो
और हर फूल तुझे-
प्यार करने के लिए-
बिल्कुल आज़ाद हो-
बिल्कुल तैयार हो।
आज किन्तु सोये हुए सपनों को
मत छेड़! मत छेड़!
बुलबुल !
जीवन के घायल सिपाही को मत छेड़!

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