बुरी है रीत दुनियां की- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

बुरी है रीत दुनियां की- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

ज़िनाकारी व मयनोशी में सारे लोग डूबे हैं
बदकारी का आलम है यहाँ मंजर अजूबे हैं
यहाँ चारों तरफ से जुल्म के तूफान उठते हैं
धरम के नाम पर देखो यहाँ शैतान उठते हैं
गुनाहों की तिजारत को यहाँ बाजार लगता है
यहाँ नापाक दौलत का बड़ा अम्बार लगता है
यहाँ की महफिलें तो रक्स से गुलजार होती हैं
मसल कर फेंक देने को यहाँ पर नार होती हैं
मिटा देते हैं बेटी को यहाँ पर कोख में माँ की
है औरत मर्द से कमतर बुरी है रीत दुनियां की
सियासत के खुदा हैं जो वो नफरत के पुजारी हैं
बहुत दौलटत जुटाकर भी वो इज्जत से भिखारी हैं

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