बुद्ध-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur 

बुद्ध-तार सप्तक -गिरिजा कुमार माथुर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Girija Kumar Mathur

आज लौटती जाती है पदचाप युगों की,
सदियों पहले का शिव-सुन्दर मूर्तिमान हो
चलता जाता है बोझीले इतिहासों पर
श्वेत हिमालय की लकीर-सा ।
प्रतिमाओं-से धुँधले बीते वर्ष आ रहे,
जिन में डूबी दिखती
ध्यान-मग्न तसवीर, बोधि-तरु के नीचे की ।
जिसे समय का हिम न प्रलय तक गला सकेगा
देश-देश से अन्तहीन वह छाया लौटी-
और लौटते आते हैं वे मठ, विहार सब,
कपिलवस्तु के भवनों की वह कांचन माला
जब सागर, वन की सीमाएं लाँघ गये थे
कुटियों के सन्देश प्यार के ।
महलों का जब स्वप्न अधूरा
पूर्ण हुआ था शीतल, मिट्टी के स्तूपों की छाया में।

वैभव की वे शिलालेख-सी यादें आतीं,
एक चाँदनी-भरी रात उस राजनगर की,
रनिवासों की नंगी बांहों-सी रंगीनी
वह रेशमी मिठास मिलन के प्रथम दिनों की-

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