बुद्ध और नाचघर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

बुद्ध और नाचघर -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

आह्वान

ओ जो तुम ताज़े,
ओ जो तुम जवान ।
ओ जो तुम अंधकार में किरणों के उभार,
ओ जो तुम बूढ़ी नसो में नए खून की रफ्तार,
ओ जो तूम जग में अमरता के सबूत फिर एक बार,
औ जो तुम सौ विध्वंसों पर एक व्यँग की मुसकान,
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा कलम,
खुलती है मेरी जबान ।
ओ जो तुम ताज़े,
ओ जो तुम जवान ।

ओ जो तुम सुन सकते हो अज्ञात की पुकार,
ओ जो तुम सुन सकते हो आनेवाली सदियों की झंकार,
ओ जो तुम नए जीवन, नए संसार के स्वागतकार,
ओ जो तुम सपना देखते हो बनाने का एक नया इंसान,
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा कलम,
खुलती है मेरी जबान ।
ओ जो तुम ताज़े,
ओ जो तुम जवान !

ओ जो तुम हो जाते हो खूबसूरती पर निसार,
ओ जो तुम अपने सीनों में लेके चलते हो अँगार,
ओ जो तुम अपने दर्द को बना देते हो गीतों की गुंजार,
ओ जो तुम जुदा दिलों को मिला देते हो छेड़कर एक तान,
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा कलम,
खुलती है मेरी जबान ।
ओ जो तुम ताज़े,
ओ जो तुम जवान ।

ओ जो तुम बाँधकर चलते हो हिम्मत का हथियार,
ओ जो तुम करते हो मुसीबतों व मुश्किलों का शिकार,
ओ जो तुम मौत के साथ करते हो खिलवार,
ओ जो तुम अपने अट्टहास से डरा देते हो मरघटों का सुनसान,
भर देते हो मुर्दों में जान,
ओ जो तुम उठाते हो नारा– उत्थान, पुनरुत्थान, अभ्युत्थान ।
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा कलम,
खुलती है मेरी जबान ।
ओ जो तुम ताज़े,
ओ जो तुम जवान ।

सृष्टि


प्रलय
कर सब नष्ट,
सब कुछ भ्रष्ट,
कर के सब किसी का अंत,
था निरभ्रांत ?-
भ्रांति नितांत ।


प्रलय में था
एक अमर अभाव,
उर का घाव,
जो उसको किए था
चिर चपल, चिर विकल, चिर विक्षुब्ध,
उसको थी कहीं यदि शांति
तो बस एक उमकी याद में
जो था कभी संसार-
जागृति, ज्योति का आगार,
जीवन शक्ति का आधार,
उसकी भृकुटि का निर्माण,
उसकी भृकुटि का संहार ।


सृष्टि, व्याकुलता प्रलय की,
प्रलय के सूने निलय की,
प्रलय के सूने हृदय की,
प्रलय के उर में उठी जो कल्पना,
वह सृष्टि,
प्रलय पलकों पर पला जो स्वप्न,
वह संसार ।

पूजा


विश्व मंदिर में,
विशाल, विराट, महदाकार, सीमाहीन,
यह क्या हो रहा है !
उड़ रहा है हर दिशा में धूम,
घूमते हैं अग्नि-पिंड समूह,
कितने लक्ष,
कितने कोटि,
जैसे ज्योति के हों व्यूह,
और उठता
एक अद्भुत गान
अम्बर मध्य
जो है मौन-सा गंभीर ।


सृष्टि आविर्भूत,
प्रलय के तम तोम से हो मुक्त,
दीपित, पूत,
दग्ध कर नीहार देती धूप,
तप से मत हिल,
तप ही कर सकता सत्य कभी जो
तेरे मन का सपना ।

तप में जल,
तप में पल,
तप में रह अविचल, अविकल ।
तप का तू पाएगी फल,
तप निश्चल,
तप निश्छल,
तप निर्मल ।

युग घूम-घूमकर आएँ,
तुझको तप में रत पाएँ,
तप की भी है क्या सीमा ?
तप काल नहीं खा सकता,
बुझ जाय सूर्य,
बुझ जाय विश्व की अग्नि,
कभी तप का प्रकाश
पड़ नहीं सकेगा धीमा ।

तू महाभाग,
जो तुझ में तप की पटी आग ।
तू इसी आग में
जल,
तू इसी आग में
ढल,
तू इसी आग में
रख विश्वास अटल ।

नया चाँद

उगा हुआ है नया चाँद
जैसे उग चुका है हज़ार बार।
आ-जा रही हैं कारें
साइकिलों की क़तारें;
पटरियों पर दोनों ओर
चले जा रहे हैं बूढ़े
ढोते ज़िंदगी का भार
जवान, करते हुए प्‍यार
बच्‍चे, करते खिलवार।
उगा हुआ है नया चाँद
जैसे उग चुका है हज़ार बार।
मैं ही क्‍यों इसे देख
एकाएक
गया हूँ रुक
गया हूँ झुक!

डैफ़ोडिल

डैफ़ोडिल, डैफ़ोडिल, डैफ़ोडिल-
मेरे चारों ओर रहे हैं खिल
मेरे चारों हँस रहे हैं खिल-खिल;
इंग्‍लैंड में है बसंत- है एप्रिल।
इनका देख के उल्‍लास
तुलना को आता है याद
मुझे अजित और अमित का हास
जो गूँजता है आध-आध मील-
मेरा भर आता है दिल-
डैफ़ोडिल, डैफ़ोडिल, डैफ़ोडिल-
जो गूँजता है हजारों मील,
मैं उसे सुनता हूँ यहाँ,
हँस रहे है वे कहाँ-ओ, दूर कहाँ!
बच्‍चों का हास निश्‍छल, निर्मल, सरल
होता है कितना प्रबल!

सृष्टि का होगा आरंभ,
मानव शिशुओं का उतरा होगा दल
पृथ्‍वी पर होगी चहल-पहल।
आल-बाल जब बहुत से हों साथ
पकड़ के एक दूसरे का हाथ
हँसी की भाषा में करते हैं बात।
उस दिन जो गूजा होगा नाद
धरती कभी भूलेगी उसकी याद?
उसी दिन को सुमिर
वह फूल उठती है फिर-फिर
फूला नहीं समाता उसका अजिर।
आदि मानव का वह उद्गार
निर्विकार,
अफसोस हज़ार,
इतनी चिंता, शंका, इतने भय, संघर्ष‍ में
गया है धँस,
कि सुनाई नहीं पड़ेगा दूसरी बार;
अफसोस हज़ार!

इतना भी है क्‍या करम
उसकी बनी है यादगार
डैफ़ोडिल का कहाँ-कहाँ तक है विस्‍तार!

हरे-हरे पौधों
हरी-हरी पत्तियों पर
सफ़ेद-सफ़ेद, पीले-पीले,
रुपहरे, सुनहरे फूल सँवरे हैं,
आसमान से जैसे
तारे उतरे हैं।
आता है याद,
कश्‍मीर में डल पर
निशात, शालिमार तक
नाव का सफ़र,
इतने फूले थे कमल
कि नील झील का जल
उनके पत्‍तों से गया था ढँक,
पत्‍ते-पत्‍ते पर पानी की बूँद
ऐसी रही थी झलक,
जैसे स्‍वर्ग से
मोती पड़े हो टपक;
सुषमा का यह भंडार
देख के, झिझक
मैंने अपनी आँखें ली थी मूँद।
बताने लगा था मल्‍लाह,
बहुत दिनों की है बात,
यहाँ आया एक सौदागर,
लोभी पर भोला,
उसे ठगने को किसी का मन डोला,
सेठ से बोला,
ये हैं कच्‍चे मोती- कुछ दिन में जाएँगे पक।
लेकर बहुत-सा धन
बेच दिया उसने मोतियों का खेत
यहाँ से वहाँ तक।
सेठ ने महिनों किया इंतज़ार,
लगाता जब भी मोतियों को हाथ,
जाते वे ढलक।
आखिरकार हार,
भर-भर के आह
वह गया मर;
उस पार बनी है उसकी क़ब्र।
सुंदरता पर हो जाओ निसार;
जो उसके साथ करते हैं व्‍यापार,
उनके हाथ लगती है क्षार।

डैफ़ोडिल का देख के मैदान
वही है मेरा हाल,
हो गया हूँ इस पर निहाल
मिट्टी की यह उमंग,
वसुंधरा का यह सिंगार
आँखें पा नहीं रही है सँभाल,
मेरे शब्‍दों में
कहाँ है इतना उन्‍मेष,
कहाँ है इतना उफान,
कहाँ है इतनी तेजी, ताज़गी,
कहाँ है इतनी जान,
कि भूमि से इनकी उठान,
कि हवा में इनके लहराव,
कि क्षितिज तक इनके फैलाव
कि चतुर्दिक इनके उन्‍माद का
कर सके बखान।
यह तो करने में समर्थ
हुए थे बस वर्ड्सवर्थ;
कभी पढ़ा था उनका गीत,
आज मन में बैठ रहा अर्थ।

पर मैं इसे नहीं सकूँगा भूल,
सदा रक्‍खूँगा याद,
आज और वर्षों बाद,
कि जब अपना घर, परिवार, देस, छोड़
आया था मैं इंग्‍लैंड,
केम्ब्रिज में रक्‍खे थे पाँव,
अज़नबी और अनजान के समान,
अपरिचित था जब हर मार्ग, हर मोड़,
अपरिचित जब हर दूकान, मकान, इंसान,
किसी से नहीं थी जान-पहचान,
तब भी यहाँ थे तीन,
जो समझते थे मुझे,
जिन्‍हें समझता था मैं,
जिनसे होता था मेरे भाव,
मेरे उच्‍छ्वास का आदान-प्रदान-
डैफ़ोडिल के फूल,
जो देते थे परिचय-भरी मुस्‍कान,
प्रभात की चिड़ियाँ,
जो गाती थीं कहीं सुना-सा गान,
और कैम की धारा,
जो विलो की झुकी हुई लता को छू-छू
बहती थी मंद-मंद, क्षीण-क्षीण!

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