बुढ़ापे की तअल्लियाँ-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

बुढ़ापे की तअल्लियाँ-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

जो नौजवां हैं उनके दिल में गुमान क्या है।
जो हम में कस है उनमें ताबो तुबान क्या है।
बूढ़ा अधेड़ अमका ढमका फलान क्या है।
हमसे जो हो मुक़ाबिल पट्ठे में जान क्या है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥1॥

हर वक़्त दिल हमारा मुग्दर ही भानता है।
तीर अब तलक हमारा तूदे ही छानता है।
हर शोख़ गुल बदन से गहरी ही छानता है।
इस बात को हमारी अल्लाह ही जानता है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥2॥

चाहें तो घूर डालें सौ खू़बरू को दम में।
और मेले छान मारें वह ज़ोर है क़दम में।
सीना फड़क रहा है खूबां के दर्दो ग़म में।
पट्ठों में वह कहां है जो गर्मियां हैं हम में।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥3॥

दुबले हुए हैं हम तो खूबां के दर्दो ग़म से।
और झुर्रियां पड़ी हैं उनके ग़मो अलम से।
मूछें सफे़द की हैं इस हिज्र के सितम से।
बूढ़ा हमें न जानो अल्लाह के करम से।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥4॥

कोई भी बाल तन पर मेरे नहीं है काला।
खूंबां के दर्दो ग़म का उन पर पड़ा है पाला।
आकर जवां मुक़ाबिल होवे कोई हमारा।
ख़ालिक से है यक़ीं यह दिखलाए वह भी पीछा।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥5॥

ऐ यार! सौ बरस की हुई अपनी उम्र आकर।
और झुर्रियां पड़ी हैं सारे बदन के ऊपर।
दिखलाते जिस घड़ी हैं मैदाँ में ज़ोर जाकर।
रुस्तम को भी समझते अपने नहीं बराबर।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥6॥

हम और जवान मिलकर दिल के तई लगावें।
और अपने-अपने गुल से मिलने की दिल में लावें।
जाकर उन्हो के घर पर जब ज़ोर आजमावें।
वह गर दिवाल कूदें हम कोठा फांदा जावें।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥7॥

जाते हैं रोज़ जितनी खूबां की बस्तियां हैं।
हर आन दीद बाजी और बुत परस्तियां हैं।
सौ सौ तरह की चुहलें जी में उकस्तियां हैं।
क्या जोश भर रहे हैं क्या ऐश मस्तियां हैं।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥8॥

दुनियां में ताक़त अपनी मशहूर इस क़दर है।
कूंचों में और मकां में देखो जिधर उधर है।
जंगल में हाथी चीता या कोई शेर नर है।
हर एक के दिल में अपना ही ख़ौफ और ख़तर है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥9॥

करते हैं हम जो यारो! अब धूम और धड़क्के।
देखें जवां तो उनके छुट जायें दम में छक्के।
पीते हैं मै के प्याले, चलते हैं मार धक्के।
क्या क्या “नज़ीर” हम भी करते हैं अब झमक्के।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥10॥

 

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