बुढ़ापे की आशिक़ी-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

बुढ़ापे की आशिक़ी-मनुष्य जीवन के रंग-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

क़ायम है जिस्म गो कि नहीं कस, ग़नीमत अस्त।
जीते तो हैं, अगरचे नहीं बस ग़नीमत अस्त।
सौ ऐश हमको गर न मिले दम ग़नीमत अस्त।
वक़्ते खि़जां चौगुल नबूद ख़स ग़नीमत अस्त।
“पीरी के दम ज़िइश्क ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाख़े कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥1॥”

करते हैं इस बुढ़ापे में खू़बां की हम तो चाह।
अहमक़ हैं खू़ब रू जो वह हंसते हैं हम पे आह।
और वह जो कुछ शऊर से रखते हैं दस्तगाह।
सो वह तो हमको देख यह कहते हैं वाह! वाह!
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥2॥

जिन दिलवरों से यारो हम अब दिल लगाते हैं।
वह सब तरस हमारे बुढ़ापे पे खाते हैं।
बोसा भी हमको देते हैं मै भी पिलाते हैं।
और राह मुंसिफ़ी से यह कहते भी जाते हैं।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥3॥

ने तन में अब है ज़ोर न चलते हैं दस्तो पा।
और झुकते झुकते सर से क़दम साथ आ लगा।
इस वक़्त में भी इश्क़ को रखते हैं जा बजा।
क्यों यारो, सच ही कहियो यह इंसाफ़ की है जा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥4॥

रोए जो हम चमन में सहर बैठ कर ज़रा।
बुलबुल से पूछा गुल ने कि बूढ़ा यह क्यूं रोया।
उसने कहा कि इसका किसी से है दिल लगा।
जब गुल ने हमको देख के हंस कर यही कहा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥5॥

ताकत बदन में कहिए तो अब नाम को नहीं।
होता है अब भी सैरो तमाशा अगर कहीं।
जाते हैं लाठी टेक के दिलशाद हम वहीं।
जो हमको देखता है वह कहता है आफ़रीं।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥6॥

कल मैकदे में हम जो गए बाक़दे दुता।
और पी शराब लोट गए शोरो गुल मचा।
उस दम हमारे देख बुढ़ापे का हौसला।
हंस-हंस के जब तो पीरेमुगां ने यही कहा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥7॥

प्यारे तुम्हारे और तो आशिक़ हैं नौ जवां।
एक हम ही सबसे बूढ़े हैं और पीरे नातवां।
वह तो रहेंगे हम हैं कुछ ही दिन के मेहमां।
बस सबको छोड़ हमसे मिलो किसलिए कि ज़ां।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥8॥

जो हैं जवान उन्हों के तो उल्फ़त हैं कारोबार।
हम बूढ़े होके इश्क़ को रखते हैं बरक़रार।
मिलते हैं दिल लगाते हैं, फिरते हैं ख़्वारो-ज़ार।
जो हम से हो सके वह ग़नीमत है मेरे यार।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥9॥

दांतों का गरचे मुंह में हमारे नहीं निशां।
बोसे पे आन अड़ते हैं तो भी हर एक आं।
इन शोखियों का वक़्त हमारे भला कहां।
पर दिल में अपने हम भी यह कहते हैं मेरी जां।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥10॥

जिनको खु़दा ने दी है जवानी की दस्तगाह।
वह तो हमेशा दिल को लगावेंगे तुम से आह।
और हम कहां फिर आवेंगे करने तुम्हारी चाह।
बस तुम अब अपने दिल में इसी पर करो निगाह।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥11॥

गो तन तमाम कांपे है और हैं सफ़ेद बाल।
तो भी निबाहते हैं मुहब्बत की चाल ढाल।
प्यारे हमारे मिलने से लाओ न कुछ मलाल।
किस वास्ते करो तुम अब इस बात पर ख्याल।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥12॥

होते हैं उल्फ़तों से जवानी में सब असीर।
हम इश्क़ से बुढ़ापे में निकले हैं बन फ़क़ीर।
जो हमको देखता है अब इस हाल में “नज़ीर”।
पढ़ता है शाद होके यही बैठ दिल पज़ीर।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥13॥

 

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