बुझा दीपक और मैं-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

बुझा दीपक और मैं-प्राणेन्द्र नाथ मिश्र -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pranendra Nath Misra

 

एक दीप जला दो मेरे लिए
एक वर्ष और मैं जी लूंगा,
दीपक की थिरकती लौ की तरह
मंदिर का प्रांगण छू लूंगा।

देखूंगा कि मेरी मिट्टी में
कुछ शेष बचा है या कि नहीं
काली बाती की खुरचन में
इतिहास लिखा है या कि नहीं।

क्या याद करूं पिछले पल को
मैं एक अकेला, माटी था,
पानी से जुड़ कर बंधन में
परिवार सदृश परिपाटी था।

कई बार मैं घूमा एक धुरी
टूटा कई बार, जुड़ा फिर फिर
आकार लिया सुंदर मैने
जब बादल प्रलय से आए घिर।

फिर तपा आग में अनुभव के
पड़ गए बदन में धब्बे भी
कभी हवा ने प्राण दिया मुझको
कभी टूटा प्रतिशत नब्बे भी।

जल गई है पूरी बाती अब
रह गया शेष थोड़ा सा तैल
पहले सा पवित्र नही है दिया
चढ़ गई बहुत बाहरी मैल।

इस मैल में दम घुट घुट कर
छोड़ेगा प्राण यह दिया कभी,
हर साल ही नई दिवाली थी
हर साल मिले मुझे लोग सभी।

इस तरह पार करता जीवन
मैं उस डेहरी पर आया हूं,
था कभी अकेले आया मैं
संबंध आज कई पाया हूं।

मैं मिट्टी का हूं इक प्रदीप
मेरे तल में भरा है अंधकार
बस इक दिन ही सत्कार मेरा
बस इक दिन है लाड़ प्यार।

पूरे वर्ष न करता याद कोई
रहता मैं पड़ा कोने में कहीं
मैं स्थिर, समय बदलता है
मेरा शुरू जहां, मेरा अंत वहीं।

आलोकित उत्सव करते हो
मेरे हृदय पे आग जला करके,
फिर मुझे फेंक देते यों ही
कूड़े करकट में जा करके।

जो संचित रहा जला डाला
अब पड़ा हुआ हूं कोने में
खाकर जैसे अब खतम हुआ
जो रखा हुआ था दोने में।

मैं पांच तत्व से बना हुआ
हे विघटन ! मुझको सता नही,
अगली दिवाली क्या फिर मैं
मिल पाऊंगा सबसे पता नही?

 

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