बुझते हुए दीपकों के नाम-नीरज की पाती -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj 

बुझते हुए दीपकों के नाम-नीरज की पाती -गोपालदास नीरज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gopal Das Neeraj

निशि हटने दो, तम मिटने दो, घर-घर ज्योति बुलाने दो
नई किरन को, नई लगन को, उठकर दिया जलाने दो।

धरा विकल है, गगन विकल है, व्याकुल हर चौपाल गली
हवा न चलती, शाख न हिलती, खिलती कोई नहीं कली,
गुमसुम मधुबन, उन्मन गुंजन, सावन की क्या बात कहें
नैना बादल, गीले आँचल, घायल रंगभरी कजली।
स्वप्न न टूटे, चाँद न रूठे, छूटे साथ न सूरज का
कर सोलह सिंगार, धरा को फिर दुल्हन बन जाने दो
नई किरन को, नई लगन को, उठकर दिया जलाने दो।

तुमने बाले दीप, दीप की ज्योति न पर आज़ाद हुई
उतना मिला प्रकाश न जितनी बाती हर बरबाद हुई
धरती रोई, अम्बर रोया, रोये चाँद सितारे भी
लुटी हुई फुलवारी अब तक किन्तु नहीं आबाद हुई
धुंधला जाये कहीं न युग की ज्योति बन्द कारा में ही
बन करके भारती उसे जनमन को गले लगाने दो
नई किरन को, नई लगन को, उठकर दिया जलाने दो।

परिवर्तन की माँग पुरानी बुझे नई लौ मुस्काये
ढले सितारे ढले कि जिससे जग में नई सुबह आये
सम्भव सह अतित्व नहीं वृद्धापन औ तरुणाई का
सूखे पत्ते झरे शीघ्र तब बगिया में मधु रितु आये।
जो खिल चुका झरेगा ही वह उसके लिए शोक कैसा?
उगती हुई बहारों को मनमाने गीत सुनाने दो।
नई किरन को, नई लगन को, उठकर दिया जलाने दो।

बुझते दीप नहीं देते हैं गौरव नई दीवाली को
बासी फूल नहीं करते हैं तिलक नई उजियाली को
नये कंठ से ही फूटा है राग सदैव नये युग का
नये श्लोक ने ही तो उत्तर दिया पुरानी गाली को
यज्ञ न फिर से को सुलग कर कोई बेबस चिनगारी
महलों से बाहर जनता का सिंहासन ले आने दो
नई किरन को, नई लगन को, उठकर दिया जलाने दो।

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