बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया-बहादुर शाह ज़फ़र-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Bahadur Shah Zafar

बीच में पर्दा दुई का था जो हायल उठ गया
ऐसा कुछ देखा कि दुनिया से मेरा दिल उठ गया

शमा ने रो-रो के काटी रात सूली पर तमाम
शब को जो महफ़िल से तेरी ऐ ज़ेब-ए-महफ़िल उठ गया
मेरी आँखों में समाया उस का ऐसा नूर-ए-हक़
शौक़-ए-नज़्ज़ारा ऐ बद्र-ए-कामिल उठ गया

ऐ ‘ज़फ़र’ क्या पूछता है बेगुनाह-ओ-बर-गुनह
उठ गया अब जिधर को दस्ते क़ातिल उठ गया

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