बिसाते-रक़्स पे साद शर्क़ो-गरब से सरे शाम-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

बिसाते-रक़्स पे साद शर्क़ो-गरब से सरे शाम-ज़िन्दां-नामा-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Faiz Ahmed Faiz

बिसाते-रक़्स पे साद शर्क़ो-गरब से सरे शाम
दमक रहा है तेरी दोस्ती का माहे-तमाम

छलक रही है तेरे हुस्ने-मेहरबाँ की शराब
भरा हुआ है लबालब हर एक निगाह का जाम

गले में तंग तिरे हरफ़े-लुतफ़ की बाहें
पसे-ख़याल कहीं सायते-सफ़र का पयाम

अभी से याद में ढलने लगी है सोहबते-शब
हरेक रू-ए-हसीं हो चला है बेश हसीं

मिले कुछ ऐसे जुदा यूं हुए कि ‘फ़ैज़’ अबके
जो दिल पे नकश बनेगा वो गुल है दाग़ नहीं

हांगचायो (चीन) जुलाई १९५६

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