बिरथा कहउ कउन सिउ मन की- शब्द-रागु आसा महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

बिरथा कहउ कउन सिउ मन की- शब्द-रागु आसा महला ९-गुरू तेग बहादुर साहिब-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Guru Teg Bahadur Sahib

बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥
लोभि ग्रसिओ दस हू दिस धावत आसा लागिओ धन की ॥1॥रहाउ॥
सुख कै हेति बहुतु दुखु पावत सेव करत जन जन की ॥
दुआरहि दुआरि सुआन जिउ डोलत नह सुध राम भजन की ॥1॥
मानस जनम अकारथ खोवत लाज न लोक हसन की ॥
नानक हरि जसु किउ नही गावत कुमति बिनासै तन की ॥2॥1॥411॥

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