बिरखै हेठि सभि जंत इकठे-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

बिरखै हेठि सभि जंत इकठे-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

बिरखै हेठि सभि जंत इकठे ॥
इकि तते इकि बोलनि मिठे ॥
असतु उदोतु भइआ उठि चले जिउ जिउ अउध विहाणीआ ॥१॥
पाप करेदड़ सरपर मुठे ॥
अजराईलि फड़े फड़ि कुठे ॥
दोजकि पाए सिरजणहारै लेखा मंगै बाणीआ ॥२॥
संगि न कोई भईआ बेबा ॥
मालु जोबनु धनु छोडि वञेसा ॥
करण करीम न जातो करता तिल पीड़े जिउ घाणीआ ॥३॥
खुसि खुसि लैदा वसतु पराई ॥
वेखै सुणे तेरै नालि खुदाई ॥
दुनीआ लबि पइआ खात अंदरि अगली गल न जाणीआ ॥४॥
जमि जमि मरै मरै फिरि जमै ॥
बहुतु सजाइ पइआ देसि लमै ॥
जिनि कीता तिसै न जाणी अंधा ता दुखु सहै पराणीआ ॥५॥
खालक थावहु भुला मुठा ॥
दुनीआ खेलु बुरा रुठ तुठा ॥
सिदकु सबूरी संतु न मिलिओ वतै आपण भाणीआ ॥६॥
मउला खेल करे सभि आपे ॥
इकि कढे इकि लहरि विआपे ॥
जिउ नचाए तिउ तिउ नचनि सिरि सिरि किरत विहाणीआ ॥७॥
मिहर करे ता खसमु धिआई ॥
संता संगति नरकि न पाई ॥
अम्रित नाम दानु नानक कउ गुण गीता नित वखाणीआ ॥8॥2॥8॥12॥20॥1019॥

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