बिनु बाजे कैसो निरतिकारी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

बिनु बाजे कैसो निरतिकारी-शब्द -गुरू अर्जन देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Arjan Dev Ji

बिनु बाजे कैसो निरतिकारी ॥
बिनु कंठै कैसे गावनहारी ॥
जील बिना कैसे बजै रबाब ॥
नाम बिना बिरथे सभि काज ॥१॥
नाम बिना कहहु को तरिआ ॥
बिनु सतिगुर कैसे पारि परिआ ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु जिहवा कहा को बकता ॥
बिनु स्रवना कहा को सुनता ॥
बिनु नेत्रा कहा को पेखै ॥
नाम बिना नरु कही न लेखै ॥२॥
बिनु बिदिआ कहा कोई पंडित ॥
बिनु अमरै कैसे राज मंडित ॥
बिनु बूझे कहा मनु ठहराना ॥
नाम बिना सभु जगु बउराना ॥३॥
बिनु बैराग कहा बैरागी ॥
बिनु हउ तिआगि कहा कोऊ तिआगी ॥
बिनु बसि पंच कहा मन चूरे ॥
नाम बिना सद सद ही झूरे ॥४॥
बिनु गुर दीखिआ कैसे गिआनु ॥
बिनु पेखे कहु कैसो धिआनु ॥
बिनु भै कथनी सरब बिकार ॥
कहु नानक दर का बीचार ॥5॥6॥19॥1140॥

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