बिगड़ता जाता वातावरण-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

बिगड़ता जाता वातावरण-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

बिगड़ता जाता वातावरण
आ जगाएं
कुछ विश्वास
बहुत ज़रूरी है
अब तो उगे खुशियां बाँटती आस

मन परदेसी
डोलता जाए
घर न लौटे
दिन-दिन बढ़ता जाए
कैसा अजब बनवास

अपनी जमीन
पराई लगे है
नज़र भी
पथराई लगे है
कंक्रीट के जंगल में
लगे है नहीं किसी का वास

चतुर करे चतुराई
प्यार दिखाए
जिस्म पुचकारे
मौका पाकर ऐसा डसे है
रूह ढोए है अपनी लाश

उपजाऊ धरा हुई है बंजर
उजड़े सपनों के बागीचे
पेड़ों से लटकते
आँसू
निगल लिया है सल्फॉस

शैतान की शैतानी देखो
पालतू किया
विज्ञान
गमले में उगाया उसने
बिन हड्डियों का मास

खुद को ऊंचा कहने वाली
अमरबेल ये
फैलती जाए
ऐसे तो मिट जाएगा
अपना गंगा-जमुनी इतिहास

 

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