बिखरे मोती-मौलाना रूमी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maulana Rumi Poetry Part 1

बिखरे मोती-मौलाना रूमी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maulana Rumi Poetry Part 1

 रूह के राज़

जब देखो कोई अपना खोल दो रूह के राज़
देखो फूल तो गाओ जैसे बुलबुल बाआवाज़

लेकिन जब देखो कोई धोखे व मक्कारी भरा
लब सी लो और बना लो अपने को बन्द घड़ा

वो पानी का दुश्मन है बोलो मत उसके आगे
तोड़ देगा वो घड़े को जाहली का पत्थर उठाके

 जंग और जलाल

चूंकि नबियों में वो रसूल रखते थे तलवार
उनकी उम्मत में हैं जवांमर्द और जंगवार

जंग और जलाल हमारे दीन की निशानी है
परबत व गुफ़ा ईसाई दीन में पाई जानी है

दिल

कहा पैग़म्बर ने हक़ ने है फ़रमाया
न किसी ऊँचे में न नीचे में हूँ समाया

अर्श भी नहीं, न ज़मीन व न आसमान
समा सकता है मुझे, प्यारे यकीन जान

मोमिन के दिल में समा जाता हूँ, है अजब
चाहो तो मेरी उन दिलों में से कर लो तलब

 रहबर

रहबर का साया खुदा के ज़िक़्र से बेहतर है
सैंकड़ों खानों व पकवानों से सबर बेहतर है

देखने वाले की आंख सौ लाठियों से बेहतर है
आंख पहचान लेती क्या मोती क्या पत्थर है

 हू से हवा में

शकलें बेशकली से बाहर आईं, गई उसी में
क्योंकि ‘सच है हम वापस लौटते उसी में’

तू मर रहा हर दम व वापस हो रहा हर दम
कहा मुस्तफ़ा ने बस एक दम का ये आलम

हमारी सोच एक तीर है उस हू से हवा में
हवा में कब तक रहे ? लौट जाता खुदा में

 मुख़ालिफ़

खुदा ने रंज व ग़म इस लिए हैं बनाए
ताकि ख़िलाफ़ उसके खुशी नज़र आए

मुख़ालफ़त से सारी चीज़ें होती हैं पैदा
कोई नहीं मुख़ालिफ़ उसका वो है छिपा

मस्जिद

बेवकूफ़ मस्जिद में जाकर तो झुकते हैं
मगर दिल वालों पर वो सितम करते हैं

वो बस इमारत है असली हक़ीक़त यहीं है
सरवरों के दिल के सिवा मस्जिद नहीं है

वो मस्जिद जो औलिया के अन्दर में है
सभी का सजदागाह है, खुदा उसी में है

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