बाल कविताएँ -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 2

बाल कविताएँ -सोहन लाल द्विवेदी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Sohan Lal Dwivedi Part 2

जी होता चिड़िया बन जाऊँ

जी होता, चिड़िया बन जाऊँ!
मैं नभ में उड़कर सुख पाऊँ!

मैं फुदक-फुदककर डाली पर,
डोलूँ तरु की हरियाली पर,
फिर कुतर-कुतरकर फल खाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

कितना अच्छा इनका जीवन?
आज़ाद सदा इनका तन-मन!
मैं भी इन-सा गाना गाऊँ!
जी होता, चिड़िया बन जाऊँ!

जंगल-जंगल में उड़ विचरूँ,
पर्वत घाटी की सैर करूँ,
सब जग को देखूँ इठलाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

कितना स्वतंत्र इनका जीवन?
इनको न कहीं कोई बंधन!
मैं भी इनका जीवन पाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

 

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं,
नादान उमर के कच्चे हैं,
पर अपनी धुन के सच्चे हैं!
जननी की जय-जय गाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

अपना पथ कभी न छोड़ेंगे,
अपना प्रण कभी न तोड़ेंगे,
हिम्मत से नाता जोड़ेंगे!
हम हिम गिर पर चढ़ जाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

हम भय से कभी न डोलेंगे,
अपनी ताकत को तोलेंगे,
माता के बंधन खोलेंगे!
हम इसकी शान बढ़ाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

 

मेरा देश

ऊँचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है
नीचे पखार पग तल, नित सिंधु झूमता है,
गंगा पवित्र यमुना, नदियाँ लहर रही हैं
पल-पल नई छटाएँ, पग पग छहर रही हैं।

वह पुण्यभूमि मेरी
वह जन्मभूमि मेरी,
वह स्वर्णभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी।

झरने अनेक झरते, जिसकी पहाड़ियों में
चिड़ियाँ चहक रही हैं, हो मस्त झाड़ियों में,
अमराइयाँ घनी हैं, कोयल पुकारती है
बहती मलय पवन है, तन मन सँवारती है।

वह धर्मभूमि मेरी
वह कर्मभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी

जन्में जहाँ थे रघुपति, जन्मी जहाँ थीं सीता,
श्रीकृष्ण ने सुनाई वंशी पुनीत गीता,
गौतम ने जन्म लेकर, जिसका सुयश बढ़ाया
जग को दया दिखाई, जग को दिया दिखाया।

वह युद्धभूमि मेरी
वह बुद्धभूमि मेरी,
वह जन्मभूमि मेरी
वह मातृभूमि मेरी!

 

मीठे बोल

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा,
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठे होते आम निराले
मीठे होते जामुन काले,
मीठे होते गन्ने गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठा होता दाख छुहारा
मीठा होता शक्कर पारा,
मीठा होता रस का घोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठी होती पुआ सुहारी
मीठी होती कुल्फी न्यारी,
मीठे रसगुल्ले अनमोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

 

नकली शेर

सुनो गधे की एक कहानी,
उसने की कैसी शैतानी।
जब होती थी रात घनेरी,
तब करता था वह नित फेरी।

चुपके चुपके बाहर जाता,
खेतों से गेहूँ खा आता।
गेहूँ खा-खा मस्ती छाई,
तब क्या उसके मन में आई।

अब आगे की सुनो कहानी,
देखो, औंघाओ मत रानी।

खाल बाघ की उसने पाई,
उसने सूरत अजब बनाई
पहनी उसने खाल बदन में,
चला खेत चरने फिर बन में।

खाल पहन ली ऐसे वैसे,
गदहा बाघ बना हो जैसे।
फिर खुश होकर सीना ताने,
दिन में चला खेत को खाने!

डरे किसान देख कर सारे,
भागे झटपट बिना विचारेे।
तब कुछ गरहे बोले ही ज्यों,
यह भी बोला चीपों चीपों!

खुली बाघ की कलई सारी,
तब तो शामत छाई भारी।
डंडे लगे धड़ाधड़ पड़ने,
लगे गधे के पैर उखड़ने।

भगा वहाँ से यह बेचारा,
सभी तरफ से हिम्मत हारा।
गिरते पड़ते घर को धाया,
मरते मरते प्राण बचाया।

 

मूर्ख पंडित

पंडित चार, पंडित चार,
इनकी सुनो कहानी यार!
सभी पढ़े थे वेद पुरान,
पर न जरा था उनको ज्ञान।

चारों थे पंडित विद्वान,
फिर भी थे पूरे नादान!
सबने मन में किया विचार,
चल विदेश में करें विहार।

घूमें चल कर देश तमाम,
पैदा करें दाम औ’ नाम।
साजे पोथी पत्रा साज,
चले सभी जंगल मंे आज।

देखा-मरा पड़ा था शेर,
पथ में था हड्डी का ढेर।
झटपट बोला पंडित एक,
अजी न बातें करो अनेक।

आओ अब अजमावें ज्ञान,
मरे शेर में लावें प्राण।
बहस और झंझट को छोड़,
दीं हड्डियाँ एक ने जोड़।

और एक ने मत्र उचार,
उसमें किया रक्त संचार।
करके यों ही अद्भुत तंत्र,
पढ़ने चला एक जब मंत्र।

बोला तब फिर पंडित एक,
करते क्या सोचो तो नेक।
ठीक नहीं करते यह काम,
होगा नहीं भला परिणाम।

काम कर रहे बिना विचार,
पढ़ लिखकर मत बनो गँवार।
मिली शेर को ज्यों ही जान,
लेगा तुरत तुम्हारे प्रान।

चलो नहीं ऐसी तुम चाल,
पैदा करो न अपना काल।
बात जरा सी लो यह मान,
उनमें बोला चतुर सुजान।

जब तक मैं चढ़ता हूँ पेड़,
तब तक रुको जहाँ है मेंड़।
चढ़ा पेड़ पर जहाँ सुजान,
आगे बढ़े शेष विद्वान।

जहाँ शेर में डाली जान,
गरजा सिंह, उठा बलवान।
थर थर लगे काँपने पाँव,
पंडित भूले सारे दाँव।

थे तीनों पंडित लाचार,
मचा खूब ही हाहाकार।
पर, सुनता था कौन पुकार?
झपट शेर ने डाला मार!

जब भी करो कभी कुछ काम,
पहले ही सोचो परिणाम।

 

मेंढक और साँप

गंगदत्त मेंढक की बच्चो,
सुन लो एक कहानी।
इसका मर्म अगर समझोगे,
बन जाओगे ज्ञानी।

बहुत दिनों की बात, कथा भी,
यह है बहुत पुरानी।
पर इतनी अच्छी है मुझको,
अब तक याद जबानी।

एक कुआँ था बड़ा, भरा था
जिसमें गहरा पानी,
राजा उसका गंगदत्त था,
गंगदत्तनी रानी।

वहीं और मेंढक मेंढकियाँ
रहती थीं मनमानी-
जल में हिलमिल खेला करतीं-
करती थीं शैतानी।

गंगदत्त को एक रोज,
इन सबने बहुत सताया।
गंगदत्त राजा के मन में
गुस्सा भी तब आया।

गंगदत्त ने कहा चलूँ मैं
इनको मजा चखाऊँ,
गंगदत्त राजा तब ही मैं
दुनियाँ में कहलाऊँ।

गंगदत्त चल पड़ा सोचता
यों ही बातें मन में।
नागदत्त नागों का राजा
उसे मिल गया बन में।

गंगदत्त ने सोचा मन में,
इसको दोस्त बनाऊँ-
तो मैं दुष्ट मेंढकों से फिर
बदला खूब चुकाऊँ।

गंगदत्त ने कहा, जरा
ठहरो, नागों के राजा!
अभी ढूँढने चला तुम्हारे
घर का मैं दरवाजा।

मुझे कूप के सभी मेंढकों
ने है बहुत सताया।
इसीलिए, मैं दुखिया बन कर
शरण तुम्हारी आया।

चाहो तुम ही मुझको खा लो,
चाहो मुझे बचाओ।
पर इन दुष्ट मेंढकों से तुम
मेरा पिंड छुड़ाओ।

नागदत्त ने कहा, नहीं
मन में घबराओ भाई!
बतलाओ तो मुझे कौन सी
आफत तुम पर आयी?

गंगदत्त ने नागदत्त को,
तब सब हाल बताया-
कैसे वहां मेंढकों ने था,
उसको खूब सताया।

नागदत्त ने कहा, चलो,
दुष्टों को अभी दिखाओ,
उनका अभी नाश करता हूँ,
सब के नाम गिनाओ।

गंगदत्त ने मन में कुछ भी,
सोचा नहीं विचारा।
चला जाति का नाश कराने,
वह पापी हत्यारा!

गंगदत्त यों नागदत्त को,
अपने घर ले आया।
उसने सभी मेंढकों को,
पल भर में तुरत दिखाया।

नागदत्त का क्या कहना था,
लगा सभी को खाने।
मची कुएँ में भारी हलचल
लगे सभी चिल्लाने!

उसका हाल न पूछो, कहते
बनता नहीं जबानी,
गला रुका जाता, आँखों में
भर भर आता पानी।

नागदत्त यों लगा कुएँ में
खाने सुख से, जीने,
खाते पीते बीत गये जब
यों ही कई महीने;

हुआ जाति नाश गए जब
सारे मेंढक मारे;
गंगदत्त से नागदत्त तब
बोला कुआँ किनारे-

बात तुम्हारी मान, यहाँ पर
रहता हूँ मैं भाई!
भोजन और बताओ, वरना
होगी बड़ी बुराई।

गंगदत्त यह सुनकर चौंका
और बहुत घबराया।
बड़ी देर चुपचाप रहा, कुछ
उसकी समझ न आया।

नागदत्त ने कहा, वंश
वालों को अपने लाओ।
अब मैं उनको ही खाऊँगा,
जाओ, जल्दी आओ।

टर्र! टर्र! कर गंगदत्त ने
कहा, सुनो हे भाई!
अब तुम अपने घर को जाओ,
तो हो बहुत भलाई।

फुफकारा तब नागदत्त ने
कहा, कहाँ अब जाऊँ?
मेरा घर तो उजड़ गया
क्या फिर से नया बनाऊँ?

अब मैं हरदम यहीं रहूँगा
कहीं नहीं जाऊँगा;
तुम लोगों को पकड़-पकड़ कर
रोज यहीं खाऊँगा!

इस प्रकार जब गंगदत्त पर
गहरा संकट आया,
उसने अपने रिश्तेदारों को
ला ला कर पहुँचाया।

नागदत्त यों रोज रोज
रिश्तेदारों को खाता,
गंगदत्त यह देख देख
मन ही मन था घबराता।

जमुनादत्त पुत्र था प्यारा
बड़े प्यार से पाला,
नागदत्त ने एक रोज ले
उसको भी खा डाला।

अब मत पूछो गंगदत्त की,
वह रोया चिल्लया;
बड़ी देर बेहोश रहा, कुछ
उसको सूझ न पाया।

गंगदत्तनी ने खुद जाकर
तब उसको समझाया।
कैसे प्राण बचें उसने
इसका उपाय बतलाया।

गंगदत्तनी बोली, अब तो
कहना मानो स्वामी!
इसमें ही कल्याण तुम्हारा
होगा, जानो स्वामी।

सब तो नाश कराया, अब तो
इसको छोड़े स्वामी।
निकल चलो बाहर, इस घर से
नाता तोड़ो स्वामी।

गंगदत्त औ गंगदत्तनी ने
घर छोड़ा अपना।
जैसा काम किया वैसा ही
उनको पड़ा भुगतना।

गंगदत्त मेंढक की बच्चो!
पूरी हुई कहानी!
मैंने याद रखी है, तुम भी
रखना याद जबानी।

जब घर में हो फूट, कभी,
दुश्मन को नहीं बुलाना।
गंगदत्त मेंढक बनकर मत
जग में हंसी करना!

Leave a Reply